भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 1200

'मेरा यह वन भी अंगारपर्ण नामसे विख्यात है। मैं गङ्गाजीके तटपर विचरता हुआ इस वनमें इच्छानुसार विचित्र क्रीड़ाएँ करता रहता हूँ।। १४।। न कौणपाः शृङ्गिणो वा न देवा न च मानुषाः। इदं समुपसर्पन्ति तत् किं समनुसर्पथ ।। १५ ।। 'मेरी उपस्थितिमें यहाँ राक्षस, यक्ष, देवता अथवा मनुष्य—कोई भी नहीं आने पाते; फिर तुमलोग कैसे आ रहे हो?' ।। १५ ।।

अर्जुन उवाच

समुद्रे हिमवत्पार्श्वे नद्यामस्यां च दुर्मते। रात्रावहनि संध्यायां कस्य गुप्तः परिग्रहः ।। १६ ।। **अर्जुन बोले—**दुर्मते! समुद्र, हिमालयकी तराई और गंगानदीके तटपर रात, दिन अथवा संध्याके समय किसका अधिकार सुरक्षित है? ।। १६ ।। भुक्तो वाप्यथवाभुक्तो रात्रावहनि खेचर। न कालनियमो ह्यस्ति गङ्गां प्राप्य सरिद्वराम् ।। १७ ।। आकाशचारी गन्धर्व! सरिताओंमें श्रेष्ठ गंगाजीके तटपर आनेके लिये यह नियम नहीं है कि यहाँ कोई खाकर आये या बिना खाये, रातमें आये या दिनमें। इसी प्रकार काल आदिका भी कोई नियम नहीं है ।। १७ ।। वयं च शक्तिसम्पन्ना अकाले त्वामधृष्णुम। अशक्ता हि रणे क्रूर युष्मानर्चन्ति मानवाः ।। १८ ।। अरे, ओ क्रूर! हमलोग तो शक्तिसम्पन्न हैं। असमयमें भी आकर तुम्हें कुचल सकते हैं। जो युद्ध करनेमें असमर्थ हैं, वे दुर्बल मनुष्य ही तुमलोगोंकी पूजा करते हैं ।। १८ ।। पुरा हिमवतश्चैषा हेमशृङ्गाद् विनिस्सृता। गङ्गा गत्वा समुद्राम्भः सप्तधा समपद्यत ।। १९ ।। गङ्गां च यमुनां चैव प्लक्षजातां सरस्वतीम्। रथस्थां सरयूं चैव गोमतीं गण्डकीं तथा ।। २० ।। अपर्युषितपापास्ते नदीः सप्त पिबन्ति ये। इयं भूत्वा चैकवप्रा शुचिराकाशगा पुनः ।। २१ ।। देवेषु गङ्गा गन्धर्व प्राप्नोत्यलकनन्दताम्। तथा पितॄन् वैतरणी दुस्तरा पापकर्मभिः। गङ्गा भवति वै प्राप्य कृष्णद्वैपायनोऽब्रवीत् ।। २२ ।। प्राचीन कालमें हिमालयके स्वर्णशिखरसे निकली हुई गंगा सात धाराओंमें विभक्त हो समुद्रमें जाकर मिल गयी हैं। जो पुरुष गंगा, यमुना, प्लक्षकी जड़से प्रकट हुई सरस्वती, रथस्था, सरयू, गोमती और गण्डकी—इन सात नदियोंका जल पीते हैं, उनके पाप तत्काल