भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1214

ततः कृतज्ञं धर्मज्ञं रूपेणासदृशं भुवि । तपत्याः सदृशं मेने सूर्यः संवरणं पतिम् ॥ १५ ॥ रूपमें इस पृथ्वीपर उनके समान दूसरा कोई पुरुष नहीं था। वे कृतज्ञ और धर्मज्ञ थे। अतः सूर्यदेवने राजा संवरणको ही तपतीके योग्य पति माना ॥ १५ ॥

दातुमैच्छत् ततः कन्यां तस्मै संवरणाय ताम् । नृपोत्तमाय कौरव्य विश्रुताभिजनाय च ॥ १६ ॥ कुरुनन्दन! उन्होंने नृपश्रेष्ठ संवरणको, जिनका उत्तम कुल सम्पूर्ण विश्वमें विख्यात था, अपनी कन्या देनेकी इच्छा की ॥ १६ ॥

यथा हि दिवि दीप्तांशुः प्रभासयति तेजसा । तथा भुवि महीपालो दीप्त्या संवरणोऽभवत् ॥ १७ ॥ जैसे आकाशमें उद्दीप्त किरणोंवाले सूर्यदेव अपने तेजसे प्रकाशित होते हैं, उसी प्रकार पृथ्वीपर राजा संवरण अपनी दिव्य कान्तिसे प्रकाशित थे ॥ १७ ॥

यथार्चयन्ति चादित्यमुद्यन्तं ब्रह्मवादिनः । तथा संवरणं पार्थ ब्राह्मणावरजाः प्रजाः ॥ १८ ॥ पार्थ! जैसे ब्रह्मवादी महर्षि उगते हुए सूर्यकी आराधना करते हैं, उसी प्रकार क्षत्रिय, वैश्य आदि प्रजाएँ महाराज संवरणकी उपासना करती थीं ॥ १८ ॥

स सोममति कान्तत्वादादित्यमति तेजसा । बभूव नृपतिः श्रीमान् सुहृदां दुर्हृदामपि ॥ १९ ॥ वे अपनी कमनीय कान्तिसे चन्द्रमाको और तेजसे सूर्यदेवको भी तिरस्कृत करते थे। राजा संवरण मित्रों तथा शत्रुओंकी मण्डलीमें भी अपनी दिव्य शोभासे प्रकाशित होते थे ॥ १९ ॥

एवंगुणस्य नृपतेस्तथावृत्तस्य कौरव । तस्मै दातुं मनश्चक्रे तपतीं तपनः स्वयम् ॥ २० ॥ कुरुनन्दन! ऐसे उत्तम गुणोंसे विभूषित तथा श्रेष्ठ आचार-व्यवहारसे युक्त राजा संवरणको भगवान् सूर्यने स्वयं ही अपनी पुत्री तपतीको देनेका निश्चय कर लिया ॥ २० ॥

स कदाचिदथो राजा श्रीमानमितविक्रमः । चचार मृगयां पार्थ पर्वतोपवने किल ॥ २१ ॥ कुन्तीनन्दन! एक दिन अमितपराक्रमी श्रीमान् राजा संवरण पर्वतके समीपवर्ती उपवनमें हिंसक पशुओंका शिकार कर रहे थे ॥ २१ ॥

चरतो मृगयां तस्य क्षुत्पिपासासमन्वितः । ममार राज्ञः कौन्तेय गिरावप्रतिमो हयः ॥ २२ ॥ स मृताश्वश्चरन् पार्थ पद्भ्यामेव गिरौ नृपः । ददर्शासदृशीं लोके कन्यामायतलोचनाम् ॥ २३ ॥