महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभूपाल संवरणने जन्मसे लेकर (उस दिनतक) जो कुछ देखा था, उसमें कोई भी रूप उन्हें उस (दिव्य किशोरी)-के सदृश नहीं प्रतीत हुआ ।। ३० ।। तया बद्धमनश्चक्षुः पाशैर्गुणमयैस्तदा । न चचाल ततो देशाद् बुबुधे न च किंचन ।। ३१ ।। उस कन्याने उस समय अपने उत्तम गुणमय पाशोंसे राजाके मन और नेत्रोंको बाँध लिया। वे अपने स्थानसे हिल-डुलतक न सके। उन्हें किसी बातकी सुध-बुध (भी) न रही ।। ३१ ।। अस्या नूनं विशालाक्ष्याः सदेवासुरमानुषम् । लोकं निर्मथ्य धात्रेदं रूपमाविष्कृतं कृतम् ।। ३२ ।। वे सोचने लगे, निश्चय ही ब्रह्माने देवता, असुर और मनुष्योंसहित सम्पूर्ण लोकोंके सौन्दर्य-सिन्धुको मथकर इस विशाल नेत्रोंवाली किशोरीके इस मनोहर रूपका आविष्कार किया होगा ।। ३२ ।। एवं संतर्कयामास रूपद्रविणसम्पदा । कन्यामसदृशीं लोके नृपः संवरणस्तदा ।। ३३ ।। इस प्रकार उस समय उसकी रूप-सम्पत्तिसे राजा संवरणने यही अनुमान किया कि संसारमें इस दिव्य कन्याकी समता करनेवाली दूसरी कोई स्त्री नहीं है ।। ३३ ।। तां च दृष्ट्वैव कल्याणीं कल्याणाभिजनो नृपः । जगाम मनसा चिन्तां कामबाणेन पीडितः ।। ३४ ।। कल्याणमय कुलमें उत्पन्न हुए वे नरेश उस कल्याणस्वरूपा कामिनीको देखते ही काम-बाणसे पीड़ित हो गये। उनके मनमें चिन्ताकी आग जल उठी ।। ३४ ।। दह्यमानः स तीव्रेण नृपतिर्मन्मथाग्निना । अप्रगल्भां प्रगल्भस्तां तदोवाच मनोहराम् ।। ३५ ।। तदनन्तर तीव्र कामाग्निसे जलते हुए राजा संवरणने लज्जारहित होकर उस लज्जाशीला एवं मनोहारिणी कन्यासे इस प्रकार पूछा— ।। ३५ ।। कासि कस्यासि रम्भोरु किमर्थं चेह तिष्ठसि । कथं च निर्जनेऽरण्ये चरस्येका शुचिस्मिते ।। ३६ ।। 'रम्भोरु! तुम कौन हो? किसकी पुत्री हो? और किसलिये यहाँ खड़ी हो? पवित्र मुसकानवाली! तुम इस निर्जन वनमें अकेली कैसे विचर रही हो? ।। ३६ ।। त्वं हि सर्वानवद्याङ्गी सर्वाभरणभूषिता । विभूषणमिवैतेषां भूषणानामभीप्सितम् ।। ३७ ।। 'तुम्हारे सभी अंग परम सुन्दर एवं निर्दोष हैं। तुम सब प्रकारके (दिव्य) आभूषणोंसे विभूषित हो। सुन्दरि! इन आभूषणोंसे तुम्हारी शोभा नहीं है, अपितु तुम स्वयं ही इन आभूषणोंकी शोभा बढ़ानेवाली अभीष्ट आभूषणके समान हो ।। ३७ ।।