महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1227, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंनेत्रोंसे सुशोभित हैं, उन अमिततेजस्वी सुरश्रेष्ठ भगवान् सूर्यको नमस्कार है। जो जगत्के एकमात्र नेत्र हैं, संसारकी सृष्टि, पालन और संहारके हेतु हैं, तीनों वेद जिनके स्वरूप हैं, जो त्रिगुणात्मक स्वरूप धारण करके ब्रह्मा, विष्णु और शिव नामसे प्रसिद्ध हैं, उन भगवान् सविताको नमस्कार है।
तमुवाच महातेजा विवस्वान् मुनिसत्तमम् ।
महर्षे स्वागतं तेऽस्तु कथयस्व यथेप्सितम् ॥ १९ ॥
तब महातेजस्वी भगवान् सूर्यने मुनिवर वसिष्ठसे कहा—‘महर्षे! तुम्हारा स्वागत है! तुम्हारी जो अभिलाषा हो, उसे कहो ॥ १९ ॥
यदिच्छसि महाभाग मत्तः प्रवदतां वर ।
तत् ते दद्यामभिप्रेतं यद्यपि स्यात् सुदुष्करम् ॥ २० ॥
‘वक्ताओंमें श्रेष्ठ महाभाग! तुम मुझसे जो कुछ चाहते हो, तुम्हारी वह अभीष्ट वस्तु कितनी ही दुर्लभ क्यों न हो, तुम्हें अवश्य दूँगा ॥ २० ॥
(स्तुतोऽस्मि वरदस्तेऽहं वरं वरय सुव्रत ।
स्तुतिस्त्वयोक्ता भक्तानां जप्येयं वरदोऽस्म्यहम् ॥)
‘उत्तम व्रतका पालन करनेवाले महर्षे! तुमने जो मेरा स्तवन किया है, इसके लिये मैं तुम्हें वर देनेको उद्यत हूँ, कोई वर माँगो। तुम्हारे द्वारा कही हुई वह स्तुति भक्तोंके लिये निरन्तर जप करनेयोग्य है। मैं तुम्हें वर देना चाहता हूँ’।
एवमुक्तः स तेनर्षिर्वसिष्ठः प्रत्यभाषत ।
प्रणिपत्य विवस्वन्तं भानुमन्तं महातपाः ॥ २१ ॥
उनके यों कहनेपर महातपस्वी मुनिवर वसिष्ठ मरीचि-माली भगवान् भास्करको प्रणाम करके इस प्रकार बोले ॥ २१ ॥
वसिष्ठ उवाच
यैषा ते तपती नाम सावित्र्यवरजा सुता ।
तां त्वां संवरणस्यार्थे वरयामि विभावसो ॥ २२ ॥
**वसिष्ठजीने कहा—**विभावसो! यह जो आपकी तपती नामकी पुत्री एवं सावित्रीकी छोटी बहिन है, इसे मैं आपसे राजा संवरणके लिये माँगता हूँ ॥ २२ ॥
स हि राजा बृहत्कीर्तिर्धर्मार्थविदुदारधीः ।
युक्तः संवरणो भर्ता दुहितुस्ते विहंगम ॥ २३ ॥
उस राजाकी कीर्ति बहुत दूरतक फैली हुई है। वे धर्म और अर्थके ज्ञाता तथा उदार बुद्धिवाले हैं; अतः आकाशचारी सूर्यदेव! महाराज संवरण आपकी पुत्रीके लिये सुयोग्य पति होंगे ॥ २३ ॥
इत्युक्तः स तदा तेन ददानीत्येव निश्चितः ।