भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

पृष्ठ 1270, कुल 2256 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1270

एवमुक्तास्ततः सर्वे राजानस्ते तमूरुजम् । ऊचुः प्रसीदेति तदा प्रसादं च चकार सः ॥ ७ ॥ **वसिष्ठजी कहते हैं—**पराशर! ब्राह्मणीके यों कहनेपर उन सब क्षत्रियोंने तब और्वको (प्रणाम करके) कहा—'आप प्रसन्न होइये।' तब (उनके विनययुक्त वचन सुनकर) और्वने प्रसन्न हो (अपने तपके प्रभावसे) उनको नेत्रोंकी ज्योति दे दी ॥ ७ ॥

अनेनैव च विख्यातो नाम्ना लोकेषु सत्तमः । स और्व इति विप्रर्षिरूरुं भित्त्वा व्यजायत ॥ ८ ॥ वे साधुशिरोमणि ब्रह्मर्षि अपनी माताका ऊरु भेदन करके उत्पन्न हुए थे, इसी कारण लोकमें 'और्व' नामसे उनकी ख्याति हुई ॥ ८ ॥

चक्षूंषि प्रतिलब्ध्वा च प्रतिजग्मुस्ततो नृपाः । भार्गवस्तु मुनिर्मेने सर्वलोकपराभवम् ॥ ९ ॥ तदनन्तर अपनी खोयी हुई आँखें पाकर वे क्षत्रियलोग लौट गये; इधर भृगुवंशी और्व मुनिने सम्पूर्ण लोकोंके पराभवका विचार किया ॥ ९ ॥

स चक्रे तात लोकानां विनाशाय महामनाः । सर्वेषामेव कात्स्न्र्येन मनः प्रवणमात्मनः ॥ १० ॥ वत्स पराशर! उन महामना मुनिने समस्त लोकोंका पूर्णरूपसे विनाश करनेकी ओर अपना मन लगाया ॥ १० ॥

इच्छन्नपचितिं कर्तुं भृगूणां भृगुनन्दनः । सर्वलोकविनाशाय तपसा महतैधत ॥ ११ ॥ भृगुकुलको आनन्दित करनेवाले उस कुमारने (क्षत्रियोंद्वारा मारे गये) अपने भृगुवंशी पूर्वजोंका सम्मान करने (अथवा उनके वधका बदला लेने)-के लिये सब लोकोंके विनाशका निश्चय किया और बहुत बड़ी तपस्याद्वारा अपनी शक्तिको बढ़ाया ॥ ११ ॥

तापयामास ताँल्लोकान् सदेवासुरमानुषान् । तपसोग्रेण महता नन्दयिष्यन् पितामहान् ॥ १२ ॥ उसने अपने पितरोंको आनन्दित करनेके लिये अत्यन्त उग्र तपस्याद्वारा देवता, असुर और मनुष्योंसहित उन सभी लोकोंको संतप्त कर दिया ॥ १२ ॥

ततस्तं पितरस्तात विज्ञाय कुलनन्दनम् । पितृलोकादुपागम्य सर्व ऊचुरिदं वचः ॥ १३ ॥ तात! तदनन्तर सभी पितरोंने अपने कुलका आनन्द बढ़ानेवाले और्व मुनिका वह निश्चय जानकर पितृलोकसे आकर यह बात कही ॥ १३ ॥

पितर ऊचुः

और्व दृष्टः प्रभावस्ते तपसोग्रस्य पुत्रक ।