भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

पृष्ठ 1278, कुल 2256 में से

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पृष्ठ 1278

तं वसिष्ठादयः सर्वे मुनयस्तत्र मेनिरे । तेजसा दीप्यमानं वै द्वितीयमिव भास्करम् ॥ ७ ॥ उस समय वसिष्ठ आदि सभी मुनियोंको वहाँ तेजसे प्रकाशमान महर्षि पराशर दूसरे सूर्यके समान जान पड़ते थे ॥ ७ ॥

ततः परमदुष्प्रापमन्यैर्ऋषिभिरुदारधीः । समापिपयिषुः सत्रं तमत्रिः समुपागमत् ॥ ८ ॥ तदनन्तर दूसरोंके लिये उस यज्ञको बंद करना अत्यन्त कठिन जानकर उदारबुद्धि महर्षि अत्रि स्वयं उस यज्ञको समाप्त करानेकी इच्छासे पराशरके पास आये ॥ ८ ॥

तथा पुलस्त्यः पुलहः क्रतुश्चैव महाक्रतुः । तत्राजग्मुरमित्रघ्न रक्षसां जीवितेप्सया ॥ ९ ॥ शत्रुओंका नाश करनेवाले अर्जुन! उसी प्रकार पुलस्त्य, पुलह, क्रतु और महाक्रतुने भी राक्षसोंके जीवनकी रक्षाके लिये वहाँ पदार्पण किया ॥ ९ ॥

पुलस्त्यस्तु वधात् तेषां रक्षसां भरतर्षभ । उवाचेदं वचः पार्थ पराशरमरिंदमम् ॥ १० ॥ भरतकुलभूषण कुन्तीकुमार! उन राक्षसोंका विनाश होता देख महर्षि पुलस्त्यने शत्रुसूदन पराशरसे यह बात कही— ॥ १० ॥

कच्चित् तातापविघ्नं ते कच्चिन्नन्दसि पुत्रक । अजानतामदोषाणां सर्वेषां रक्षसां वधात् ॥ ११ ॥ ‘तात! तुम्हारे इस यज्ञमें कोई विघ्न तो नहीं पड़ा? बेटा! तुम्हारे पिताकी हत्याके विषयमें कुछ भी न जाननेवाले इन सभी निर्दोष राक्षसोंका वध करके क्या तुम्हें प्रसन्नता होती है? ॥ ११ ॥

प्रजोच्छेदमिमं मह्यं न हि कर्तुं त्वमर्हसि । नैष तात द्विजातीनां धर्मो दृष्टस्तपस्विनाम् ॥ १२ ॥ ‘वत्स! मेरी संततिका तुम्हें इस प्रकार उच्छेद नहीं करना चाहिये। तात! यह हिंसा तपस्वी ब्राह्मणोंका धर्म कभी नहीं मानी गयी ॥ १२ ॥

शम एव परो धर्मस्तमाचर पराशर । अधर्मिष्ठं वरिष्ठः सन् कुरुषे त्वं पराशर ॥ १३ ॥ ‘पराशर! शान्त रहना ही (ब्राह्मणोंका) श्रेष्ठ धर्म है, अतः उसीका आचरण करो। तुम श्रेष्ठ ब्राह्मण होकर भी यह पापकर्म करते हो? ॥ १३ ॥

शक्तिं चापि हि धर्मज्ञं नातिक्रान्तुमिहार्हसि । प्रजायाश्च ममोच्छेदं न चैवं कर्तुमर्हसि ॥ १४ ॥ ‘तुम्हारे पिता शक्ति धर्मके ज्ञाता थे, तुम्हें (इस अधर्मकृत्यद्वारा) उनकी मर्यादाका उल्लङ्घन नहीं करना चाहिये। फिर मेरी संतानोंका विनाश करना तुम्हारे लिये कदापि उचित

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