भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1284

शत्रुसूदन अर्जुन! महाभाग वसिष्ठजी अपनी बड़ी भारी तपस्या तथा ज्ञानयोगके प्रभावसे ये सब बातें जानते थे ।। २३ ।।

मुक्तशापश्च राजर्षिः कालेन महता ततः । ऋतुकालेऽभिपतितो मदयन्त्या निवारितः ।। २४ ।। दीर्घकालके पश्चात् वे राजर्षि जब शापसे मुक्त हुए, तब ऋतुकालमें अपनी पत्नीके पास गये। परंतु उनकी रानी मदयन्तीने उन्हें (उक्त शापकी याद दिलाकर) रोक दिया ।। २४ ।।

न हि सस्मार स नृपस्तं शापं काममोहितः । देव्याः सोऽथ वचः श्रुत्वा सम्भ्रान्तो नृपसत्तमः ।। २५ ।। राजा कल्माषपाद कामसे मोहित हो रहे थे। इसलिये उन्हें शापका स्मरण नहीं रहा। महारानी मदयन्तीकी बात सुनकर वे नृपश्रेष्ठ बड़े सम्भ्रम (घबराहट)-में पड़ गये ।। २५ ।।

तं शापमनुसंस्मृत्य पर्यतप्यद् भृशं तदा । एतस्मात् कारणाद् राजा वसिष्ठं संनयोजयत् । स्वदारेषु नरश्रेष्ठ शापदोषसमन्वितः ।। २६ ।। उस शापको बार-बार याद करके उन्हें बड़ा संताप हुआ। नृपश्रेष्ठ! इसी कारण शापदोषसे युक्त राजा कल्माषपादने महर्षि वसिष्ठका अपनी पत्नीके साथ नियोग कराया ।। २६ ।।

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि चैत्ररथपर्वणि वसिष्ठोपाख्याने एकाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १८१ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत चैत्ररथपर्वमें वसिष्ठोपाख्यानविषयक एक सौ इक्यासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १८१ ।।