भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1286

तान् धौम्यः प्रतिजग्राह सर्ववेदविदां वरः । वन्येन फलमूलेन पौरोहित्येन चैव ह ॥ ७ ॥ सम्पूर्ण वेदोंके विद्वानोंमें श्रेष्ठ धौम्यने जंगली फल-मूल अर्पण करके तथा पुरोहितीके लिये स्वीकृति देकर उन सबका सत्कार किया ॥ ७ ॥ ते समाशंसिरे लब्धां श्रियं राज्यं च पाण्डवाः । ब्राह्मणं तै पुरस्कृत्य पाञ्चालीं च स्वयंवरे ॥ ८ ॥ पाण्डवोंने उन ब्राह्मणदेवताको पुरोहित बनाकर यह भलीभाँति विश्वास कर लिया कि 'हमें अपना राज्य और धन अब मिले हुएके ही समान है।' साथ ही उन्हें यह भी भरोसा हो गया कि 'स्वयंवरमें द्रौपदी हमें मिल जायगी' ॥ ८ ॥ पुरोहितेन तेनाथ गुरुणा संगतास्तदा । नाथवन्तमिवात्मानं मेनिरे भरतर्षभाः ॥ ९ ॥ उन गुरु एवं पुरोहितके साथ हो जानेसे उस समय भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ पाण्डवोंने अपने-आपको सनाथ-सा समझा ॥ ९ ॥ स हि वेदार्थतत्त्वज्ञस्तेषां गुरुरुदारधीः । तेन धर्मविदा पार्था याज्या धर्मविदः कृताः ॥ १० ॥ उदारबुद्धि धौम्य वेदार्थके तत्त्वज्ञ थे, वे पाण्डवोंके गुरु हुए। उन धर्मज्ञ मुनिने धर्मज्ञ कुन्तीकुमारोंको अपना यजमान बना लिया ॥ १० ॥ वीरांस्तु सहितान् मेने प्राप्तराज्यान् स्वधर्मतः ।