महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतत्पश्चात् वे सभी नरेश स्वयंवर देखनेकी इच्छासे वहाँ रखे हुए मंचोंपर बैठे। उस नगरके समस्त निवासी भी यथास्थान आकर बैठ गये। उन सबका कोलाहल क्षुब्ध हुए समुद्रके भयंकर गर्जनके समान सुनायी पड़ता था ॥ १४-१५ ॥
शिशुमारशिरः प्राप्य न्यविशंस्ते स्म पार्थिवाः ।
प्रागुत्तरेण नगराद् भूमिभागे समे शुभे ॥
समाजवाटः शुशुभे भवनैः सर्वतो वृतः ॥ १६ ॥
वहाँकी बैठक शिशुमारकी आकृतिमें सजायी गयी थी। शिशुमारके शिरोभागमें सब राजा अपने-अपने मंचोंपर बैठे थे। नगरसे ईशानकोणमें सुन्दर एवं समतल भूमिपर स्वयंवरसभाका रंगमण्डप सजाया गया था, जो सब ओरसे सुन्दर भवनोंद्वारा घिरा होनेके कारण बड़ी शोभा पा रहा था ॥ १६ ॥
प्राकारपरिखोपेतो द्वारतोरणमण्डितः ।
वितानेन विचित्रेण सर्वतः समलंकृतः ॥ १७ ॥
उसके सब ओर चहारदीवारी और खाई बनी थीं। अनेक फाटक और दरवाजे उस मण्डपकी शोभा बढ़ा रहे थे। विचित्र चंदोवेसे उस सभाभवनको सब ओरसे सजाया गया था ॥ १७ ॥
तूर्यौघशतसंकीर्णः पराग्र्यागुरुधूपितः ।
चन्दनोदकसिक्तश्च माल्यदामोपशोभितः ॥ १८ ॥
वहाँ सैकड़ों प्रकारके बाजे बज रहे थे। बहुमूल्य अगुरुधूपकी सुगन्ध चारों ओर फैल रही थी। फर्शपर चन्दनके जलका छिड़काव किया गया था। सब ओर फूलोंकी मालाएँ और हार टँगे थे, जिससे वहाँकी शोभा बहुत बढ़ गयी थी ॥ १८ ॥
कैलासशिखरप्रख्यैर्नभस्तलविलेखिभिः ।
सर्वतः संवृतः शुभ्रैः प्रासादैः सुकृतोच्छ्रयैः ॥ १९ ॥
उस रंगमण्डपके चारों ओर कैलासशिखरके समान ऊँचे और श्वेत रंगके गगनचुम्बी महल बने हुए थे ॥ १९ ॥
सुवर्णजालसंवीतैर्मणिकुट्टिमभूषणैः ।
सुखारोहणसोपानैर्महासनपरिच्छदैः ॥ २० ॥
उन्हें भीतरसे सोनेके जालीदार पर्दों और झालरोंसे सजाया गया था। फर्श और दीवारोंमें मणि एवं रत्न जड़े गये थे। उत्तम सुखपूर्वक चढ़नेयोग्य सीढ़ियाँ बनी थीं। बड़े-बड़े आसन और बिछावन आदि बिछाये गये थे ॥ २० ॥
स्रग्दामसमवच्छन्नैरगुरूत्तमवासितैः ।
हंसांशुवर्णैर्बहुभिरायोजनसुगन्धिभिः ॥ २१ ॥
अनेक प्रकारकी मालाएँ और हार उन भवनोंकी शोभा बढ़ा रहे थे। अगुरुकी सुगन्ध छा रही थी। वे हंस और चन्द्रमाकी किरणोंके समान श्वेत दिखायी देते थे। उनके भीतरसे