भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 1301

समुद्रसेनपुत्रश्च चन्द्रसेनः प्रतापवान् ॥ ११ ॥ जलसंधः पितापुत्रौ विदण्डो दण्ड एव च । पौण्ड्रको वासुदेवश्च भगदत्तश्च वीर्यवान् ॥ १२ ॥ कालिङ्गस्ताम्रलिप्तश्च पत्तनाधिपतिस्तथा । मद्रराजस्तथा शल्यः सहपुत्रो महारथः ॥ १३ ॥ रुक्माङ्गदेन वीरेण तथा रुक्मरथेन च । कौरव्यः सोमदत्तश्च पुत्राश्चास्य महारथाः ॥ १४ ॥ समवेतास्त्रयः शूरा भूरिभूरिश्रवाः शलः । सुदक्षिणश्च काम्बोजो दृढधन्वा च पौरवः ॥ १५ ॥ इनके सिवा और भी असंख्य महामना क्षत्रियशिरोमणि भूमिपाल यहाँ आये हैं। उधर देखो, गान्धारराज सुबलके पुत्र शकुनि, वृषक और बृहद्वल बैठे हैं। गान्धारराजके ये सभी पुत्र यहाँ पधारे हैं। अश्वत्थामा और भोज—ये दोनों महान् तेजस्वी और सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ हैं और तुम्हारे लिये गहने-कपड़ोंसे सज-धजकर यहाँ आये हैं। राजा बृहन्त, मणिमान्, दण्डधार, सहदेव, जयत्सेन, राजा मेघसंधि, अपने दोनों पुत्रों शंख और उत्तरके साथ राजा विराट, वृद्धक्षेमके पुत्र सुशर्मा, राजा सेनाबिन्दु, सुकेतु और उनके पुत्र सुवर्चा, सुचित्र, सुकुमार, वृक, सत्यधृति, सूर्यध्वज, रोचमान, नील, चित्रायुध, अंशुमान्, चेकितान, महाबली श्रेणिमान्, समुद्रसेनके प्रतापी पुत्र चन्द्रसेन, जलसंध, विदण्ड और उनके पुत्र दण्ड, पौण्ड्रक वासुदेव, पराक्रमी भगदत्त, कलिंगनरेश ताम्रलिप्तनरेश, पाटनके राजा, अपने दो पुत्रों वीर रुक्मांगद तथा रुक्मरथके साथ महारथी मद्रराज शल्य, कुरुवंशी सोमदत्त तथा उनके तीन महारथी शूरवीर पुत्र भूरि, भूरिश्रवा और शल, काम्बोजदेशीय सुदक्षिण, पूरुवंशी दृढधन्वा ॥ ५—१५ ॥ बृहद्वलः सुषेणश्च शिबिरौशीनरस्तथा । पटच्चरनिहन्ता च कारूषाधिपतिस्तथा ॥ १६ ॥ संकर्षणो वासुदेवो रौक्मिणेयश्च वीर्यवान् । साम्बश्च चारुदेष्णश्च प्रद्युम्निः सगदस्तथा ॥ १७ ॥ अक्रूरः सात्यकिश्चैव उद्धवश्च महामतिः । कृतकर्मा च हार्दिक्यः पृथुर्विपृथुरेव च ॥ १८ ॥ विदूरथश्च कङ्कश्च शङ्कुश्च सगवेषणः । आशावहोऽनिरुद्धश्च शमीकः सारिमेजयः ॥ १९ ॥ वीरो वातपतिश्चैव झिल्लीपिण्डारकस्तथा । उशीनरश्च विक्रान्तो वृष्णयस्ते प्रकीर्तिताः ॥ २० ॥ महाबली सुषेण, उशीनरदेशीय शिबि तथा चोर-डाकुओंको मार डालनेवाले कारूषाधिपति भी यहाँ आये हैं। इधर संकर्षण, वासुदेव, (भगवान् श्रीकृष्ण)