महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंषडशीत्यधिकशततमोऽध्यायः
राजाओंका लक्ष्यवेधके लिये उद्योग और असफल होना
वैशम्पायन उवाच
तेऽलंकृताः कुण्डलिनो युवानः
परस्परं स्पर्धमाना नरेन्द्राः ।
अस्त्रं बलं चात्मनि मन्यमानाः
सर्वे समुत्पेतुरुदायुधास्ते ॥ १ ॥
रूपेण वीर्येण कुलेन चैव
शीलेन वित्तेन च यौवनेन ।
समिद्धदर्पा मदवेगभिन्ना
मत्ता यथा हैमवता गजेन्द्राः ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! वे सब नवयुवक राजा अनेक आभूषणोंसे विभूषित हो कानोंमें कुण्डल पहने और परस्पर लाग-डाँट रखते हुए हाथोंमें अस्त्र-शस्त्र लिये अपने-अपने आसनोंसे उठने लगे। उन्हें अपनेमें ही सबसे अधिक अस्त्रविद्या और बलके होनेका अभिमान था; सभीको अपने रूप, पराक्रम, कुल, शील, धन और जवानीका बड़ा घमंड था। वे सभी मस्तकसे वेगपूर्वक मदकी धारा बहानेवाले हिमाचल-प्रदेशके गजराजोंकी भाँति उन्मत्त हो रहे थे ॥ १-२ ॥
परस्परं स्पर्धया प्रेक्षमाणाः
संकल्पजेनाभिपरिप्लुताङ्गाः ।
कृष्णा ममैवेत्यभिभाषमाणा
नृपासनेभ्यः सहसोदतिष्ठन् ॥ ३ ॥
वे एक-दूसरेको बड़ी स्पर्धासे देख रहे थे। उनके सभी अंगोंमें कामोन्माद व्याप्त हो रहा था। 'कृष्णा तो मेरी ही होनेवाली है' यह कहते हुए वे अपने राजोचित आसनोंसे सहसा उठकर खड़े हो गये ॥ ३ ॥
ते क्षत्रिया रङ्गगताः समेता
जिगीषमाणा द्रुपदात्मजां ताम् ।
चकाशिरे पर्वतराजकन्या-
मुमां यथा देवगणाः समेताः ॥ ४ ॥
द्रुपदकुमारीको पानेकी इच्छासे रंगमण्डपमें एकत्र हुए वे क्षत्रियनरेश गिरिराजनन्दिनी उमाके विवाहमें इकट्ठे हुए देवताओंकी भाँति शोभा पा रहे थे ॥ ४ ॥
कन्दर्पबाणाभिनिपीडिताङ्गाः