महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1311, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंनहीं' ॥ ७ ॥
ब्राह्मणा ऊचुः नावहास्या भविष्यामो न च लाघवमास्थिताः । न च विद्विष्टतां लोके गमिष्यामो महीक्षिताम् ॥ ८ ॥ ब्राह्मण बोले—(भाइयो!) हमारी हँसी नहीं होगी। न हमें किसीके सामने छोटा ही बनना पड़ेगा और लोकमें हमलोग राजाओंके द्वेषपात्र भी नहीं होंगे। (अतः इन बातोंकी चिन्ता छोड़ दो) ॥ ८ ॥
केचिदाहुर्युवा श्रीमान् नागराजकरोपमः । पीनस्कन्धोरुबाहुश्च धैर्येण हिमवानिव ॥ ९ ॥ कुछ ब्राह्मणोंने कहा—'यह सुन्दर युवक नागराज ऐरावतके शुण्ड-दण्डके समान हृष्ट-पुष्ट दिखायी देता है। इसके कंधे सुपुष्ट और भुजाएँ बड़ी-बड़ी हैं। यह धैर्यमें हिमालयके समान जान पड़ता है ॥ ९ ॥
सिंहखेलगतिः श्रीमान् मत्तनागेन्द्रविक्रमः । सम्भाव्यमस्मिन् कर्मेदमुत्साहाच्चानुमीयते ॥ १० ॥ 'इसकी सिंहके समान मस्तानी चाल है। यह शोभाशाली तरुण मतवाले गजराजके समान पराक्रमी प्रतीत होता है। इस वीरके लिये यह कार्य करना सम्भव है। इसका उत्साह देखकर भी ऐसा ही अनुमान होता है ॥ १० ॥
शक्तिरस्य महोत्साहा न ह्यशक्तः स्वयं व्रजेत् । न च तद् विद्यते किंचित् कर्म लोकेषु यद् भवेत् ॥ ११ ॥ ब्राह्मणानामसाध्यं च नृषु संस्थानचारिषु । अब्भक्षा वायुभक्षाश्च फलाहारा दृढव्रताः ॥ १२ ॥ दुर्बला अपि विप्रा हि बलीयांसः स्वतेजसा । ब्राह्मणो नावमन्तव्यः सदसद् वा समाचरन् ॥ १३ ॥ सुखं दुःखं महद् ह्रस्वं कर्म यत् समुपागतम् । (धनुर्वेदे च वेदे च योगेषु विविधेषु च । न तं पश्यामि मेदिन्यां ब्राह्मणाभ्यधिको भवेत् ॥ मन्त्रयोगबलेनापि महताऽऽत्मबलेन वा । जृम्भयेयुरमुं लोकमथवा द्विजसत्तमाः ॥) जामदग्न्येन रामेण निर्जिताः क्षत्रिया युधि ॥ १४ ॥
इसमें शक्ति और महान् उत्साह है। यदि यह असमर्थ होता तो स्वयं ही धनुषके पास जानेका साहस नहीं करता। सम्पूर्ण लोकोंमें देवता, असुर आदिके रूपमें विचरनेवाले पुरुषोंका ऐसा कोई कार्य नहीं है, जो ब्राह्मणोंके लिये असाध्य हो। ब्राह्मणलोग जल पीकर,