भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1321

हमारी सहायता लेना चाहेंगे तो हम इसके लिये प्रयत्न करेंगे। वीरवर! मेरा विश्वास है कि पाण्डुपुत्र अर्जुनकी पराजय नहीं हो सकती।' तमब्रवीन्निर्जलतोयदाभो हलायुधोऽनन्तरजं प्रतीतः। प्रीतोऽस्मि दृष्ट्वा हि पितृष्वसारं पृथां विमुक्तां सह कौरवाग्र्यैः॥ २४॥ जलहीन मेघके समान गौरवर्णवाले हलधर (बलरामजी)-ने अपने छोटे भाई श्रीकृष्णकी बातपर विश्वास करके उनसे कहा—'भैया! कुरुकुलके श्रेष्ठ वीर पाण्डवोंसहित अपनी बुआ कुन्तीको लाक्षागृहसे बची हुई देखकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई है'॥ २४॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि स्वयंवरपर्वणि कृष्णवाक्ये अष्टाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १८८॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत स्वयंवरपर्वमें श्रीकृष्णवाक्यविषयक एक सौ अठासीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १८८॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ १/३ श्लोक मिलाकर कुल २६ १/३ श्लोक हैं।)


* ऊर्ध्वविस्तृतदोर्मानि तालमित्यभिधीयते। इस वचनके अनुसार एक मनुष्य अपनी बाँहको ऊपर उठाकर खड़ा हो तो उस हाथसे लेकर पैरतककी लम्बाईको 'ताल' कहते हैं।