भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1323

तब युद्धके लिये उत्सुक उन राजाओंने कठोर स्वरमें ये बातें कहीं—'युद्धकी इच्छावाले ब्राह्मणका भी रणभूमिमें वध शास्त्रानुकूल देखा गया है' ।। ६ ।।

इत्येवमुक्त्वा राजानः सहसा दुद्रुवुर्द्विजान् । ततः कर्णो महातेजा जिष्णुं प्रति ययौ रणे ।। ७ ।। यों कहकर वे राजालोग सहसा ब्राह्मणोंकी ओर दौड़े। महातेजस्वी कर्ण अर्जुनकी ओर युद्धके लिये बढ़ा ।। ७ ।।

युद्धार्थी वासिताहेतोर्गजः प्रतिगजं यथा । भीमसेनं ययौ शल्यो मद्राणामीश्वरो बली ।। ८ ।। ठीक उसी तरह, जैसे हथिनीके लिये लड़नेकी इच्छा रखकर एक हाथी अपने प्रतिद्वन्द्वी दूसरे हाथीसे भिड़नेके लिये जा रहा हो, महाबली मद्रराज शल्य भीमसेनसे जा भिड़े ।। ८ ।।

दुर्योधनादयः सर्वे ब्राह्मणैः सह संगताः । मृदुपूर्वमयत्नेन प्रत्ययुध्यंस्तदाहवे ।। ९ ।। दुर्योधन आदि सभी (भूपाल) एक साथ अन्यान्य ब्राह्मणोंके साथ उस युद्धभूमिमें बिना किसी प्रयासके (खेल-सा करते हुए) कोमलतापूर्वक (शीत) युद्ध करने लगे ।। ९ ।।

ततोऽर्जुनः प्रत्यविध्यदापतन्तं शितैः शरैः । कर्णं वैकर्तनं श्रीमान् विकृष्य बलवद् धनुः ।। १० ।। तब तेजस्वी अर्जुनने अपने धनुषको जोरसे खींचकर अपनी ओर वेगसे आते हुए सूर्यपुत्र कर्णको कई तीक्ष्ण बाण मारे ।। १० ।।

तेषां शराणां वेगेन शितानां तिग्मतेजसाम् । विमुह्यमानो राधेयो यत्नात् तमनुधावति ।। ११ ।। उन दुःसह तेजवाले तीखे बाणोंके वेगपूर्वक आघातसे राधानन्दन कर्णको मूर्च्छा आने लगी। वह बड़ी कठिनाईसे अर्जुनकी ओर बढ़ा ।। ११ ।।

तावुभावप्यनिर्देश्यौ लाघवाज्जयतां वरौ । अयुध्येतां सुसंरब्धावन्योन्यविजिगीषिणौ ।। १२ ।। विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ वे दोनों योद्धा हाथोंकी फुर्ती दिखानेमें बेजोड़ थे, उनमें कौन बड़ा है और कौन छोटा—यह बताना असम्भव था। दोनों ही एक-दूसरेको जीतनेकी इच्छा रखकर बड़े क्रोधसे लड़ रहे थे ।। १२ ।।

कृते प्रतिकृतं पश्य पश्य बाहुबलं च मे । इति शूरार्थवचनैरभाषेतां परस्परम् ।। १३ ।। 'देखो, तुमने जिस अस्त्रका प्रयोग किया था, उसे रोकनेके लिये मैंने यह अस्त्र चलाया है। देख लो, मेरी भुजाओंका बल!' इस प्रकार शौर्यसूचक वचनोंद्वारा वे आपसमें बातें भी करते जाते थे ।। १३ ।।