महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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द्विनवत्यधिकशततमोऽध्यायः
धृष्टद्युम्नके द्वारा द्रौपदी तथा पाण्डवोंका हाल सुनकर राजा द्रुपदका उनके पास पुरोहितको भेजना तथा पुरोहित और युधिष्ठिरकी बातचीत
वैशम्पायन उवाच
ततस्तथोक्तः परिहृष्टरूपः पित्रे शशंसार्थ स राजपुत्रः । धृष्टद्युम्नः सोमकानां प्रबर्हो वृत्तं यथा येन हृता च कृष्णा ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! राजा द्रुपदके यों कहनेपर सोमकशिरोमणि राजकुमार धृष्टद्युम्न अत्यन्त हर्षमें भरकर वहाँ जो वृत्तान्त हुआ था एवं जो कृष्णाको ले गया, वह कौन था, वह सब समाचार कहने लगे ॥ १ ॥
धृष्टद्युम्न उवाच
योऽसौ युवा व्यायतलोहिताक्षः कृष्णाजिनी देवसमानरूपः । यः कार्मुकाग्र्यं कृतवानधिज्यं लक्ष्यं च यः पातितवान् पृथिव्याम् ॥ २ ॥ असज्जमानश्च ततस्तरस्वी वृतो द्विजाग्र्यैरभिपूज्यमानः । चक्राम वज्रीव दितेः सुतेषु सर्वैश्च देवै ऋषिभिश्च जुष्टः ॥ ३ ॥
धृष्टद्युम्न बोले— महाराज! जिन विशाल एवं लाल नेत्रोंवाले, कृष्णमृगचर्मधारी तथा देवताके समान मनोहर रूपवाले तरुण वीरने श्रेष्ठ धनुषपर प्रत्यंचा चढ़ायी और लक्ष्यको वेधकर पृथ्वीपर गिराया था, वे किसीका भी साथ न करके अकेले ही बड़े वेगसे आगे बढ़े। उस समय बहुत-से श्रेष्ठ ब्राह्मण उन्हें घेरे हुए थे और उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा कर रहे थे। सम्पूर्ण देवताओं तथा ऋषियोंसे सेवित देवराज इन्द्र जैसे दैत्योंकी सेनाके भीतर निःशंक