महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1347, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंनैवंगते सौमकिरद्य राजा संतापमर्हत्यसुखाय कर्तुम् ॥ २५ ॥ ‘राजाने वहाँ वर्ण, शील, कुल और गोत्रके विषयमें कोई अभिप्राय नहीं व्यक्त किया था। धनुषपर प्रत्यंचा चढ़ाकर लक्ष्यवेध कर देनेपर ही कन्यादानकी घोषणा की थी। इस महात्मा वीरने उसी घोषणाके अनुसार राजाओंकी मण्डलीमें राजकुमारी कृष्णापर विजय पायी है। ऐसी दशामें सोमकवंशी राजा द्रुपदको अब सुखका अभाव करनेवाला संताप नहीं करना चाहिये ॥ २४-२५ ॥
कामश्च योऽसौ द्रुपदस्य राज्ञः स चापि सम्पत्स्यति पार्थिवस्य । सम्प्राप्यरूप्रां हि नरेन्द्रकन्या- मिमामहं ब्राह्मण साधु मन्ये ॥ २६ ॥ ‘ब्राह्मण! राजा द्रुपदकी जो पहलेकी अभिलाषा है, वह भी पूरी होगी। इस राजकन्याको हम सर्वथा ग्रहण करनेयोग्य एवं उत्तम मानते हैं ॥ २६ ॥
न तद् धनुर्मन्दबलेन शक्यं मौर्व्या समायोजयितुं तथा हि । न चाकृतास्त्रेण न हीनजेन लक्ष्यं तथा पातयितुं हि शक्यम् ॥ २७ ॥ ‘कोई बलहीन पुरुष उस विशाल धनुषपर प्रत्यंचा नहीं चढ़ा सकता था। जिसने अस्त्रविद्याकी पूर्ण शिक्षा न पायी हो, ऐसे पुरुषके अथवा किसी नीच कुलके मनुष्यके लिये भी उस लक्ष्यको गिराना असम्भव था ॥ २७ ॥
तस्मान्न तापं दुहितुर्निमित्तं पाञ्चालराजोऽर्हति कर्तुमद्य । न चापि तत्पातनमन्यथेह कर्तुं हि शक्यं भुवि मानवेन ॥ २८ ॥ ‘अतः पांचालराजको अब अपनी पुत्रीके लिये पश्चात्ताप करना उचित नहीं है। इस पृथ्वीपर उस वीरके सिवा ऐसा कोई मनुष्य नहीं है, जो उस लक्ष्यको वेध सके’ ॥ २८ ॥
एवं ब्रुवत्येव युधिष्ठिरे तु पाञ्चालराजस्य समीपतोऽन्यः । तत्राजगामाशु नरो द्वितीयो निवेदयिष्यन्निह सिद्धमन्नम् ॥ २९ ॥ राजा युधिष्ठिर यों कह ही रहे थे कि पांचालराज द्रुपदके पाससे एक दूसरा मनुष्य यह समाचार देनेके लिये शीघ्रतापूर्वक आया कि ‘राजभवनमें आपलोगोंके लिये भोजन तैयार है’ ॥ २९ ॥