महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमंगलाचारका पालन प्रारम्भ कर दें' ।। २० ।।
वैशम्पायन उवाच
तमब्रवीत् ततो राजा धर्मात्मा च युधिष्ठिरः ।
ममापि दारसम्बन्धः कार्यस्तावद् विशाम्पते ।। २१ ।।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**तब धर्मात्मा राजा युधिष्ठिरने उनसे कहा—'राजन्! विवाह तो मेरा भी करना होगा' ।। २१ ।।
द्रुपद उवाच
भवान् वा विधिवत् पाणिं गृह्णातु दुहितुर्मम ।
यस्य वा मन्यसे वीर तस्य कृष्णामुपादिश ।। २२ ।।
**द्रुपद बोले—**वीर! तब आप ही विधिपूर्वक मेरी पुत्रीका पाणिग्रहण करें अथवा आप अपने भाइयोंमेंसे जिसके साथ चाहें, उसीके साथ कृष्णाको विवाहकी आज्ञा दे दें ।। २२ ।।
युधिष्ठिर उवाच
सर्वेषां महिषी राजन् द्रौपदी नो भविष्यति ।
एवं प्रव्याहृतं पूर्वं मम मात्रा विशाम्पते ।। २३ ।।
**युधिष्ठिरने कहा—**राजन्! द्रौपदी तो हम सभी भाइयोंकी पटरानी होगी। मेरी माताने पहले हम सब लोगोंको ऐसी ही आज्ञा दे रखी है ।। २३ ।।
अहं चाप्यनिविष्टो वै भीमसेनश्च पाण्डवः ।
पार्थेन विजिता चैषा रत्नभूता सुता तव ।। २४ ।।
मैं तथा पाण्डव भीमसेन भी अभीतक अविवाहित हैं और आपकी इस रत्नस्वरूपा कन्याको अर्जुनने जीता है ।। २४ ।।
एष नः समयो राजन् रत्नस्य सह भोजनम् ।
न च तं हातुमिच्छामः समयं राजसत्तम ।। २५ ।।
महाराज! हम लोगोंमें यह शर्त हो चुकी है कि रत्नको हम सब लोग बाँटकर एक साथ उपभोग करेंगे। नृपशिरोमणे! हम अपनी उस (पुरानी) शर्तको छोड़ना या तोड़ना नहीं चाहते ।। २५ ।।
सर्वेषां धर्मतः कृष्णा महिषी नो भविष्यति ।
आनुपूर्व्येण सर्वेषां गृह्णातु ज्वलने करान् ।। २६ ।।
अतः कृष्णा धर्मके अनुसार हम सभीकी महारानी होगी। इसलिये वह प्रज्वलित अग्निके सामने क्रमशः हम सबका पाणिग्रहण करे ।। २६ ।।
द्रुपद उवाच