भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 1373

देवास्त्वस्मानादधीरञ्जननयां धर्मो वायुर्मघवानश्विनौ च। अस्त्रैर्दिव्यैर्मानुषान् योधयित्वा आगन्तारः पुनरेवेन्द्रलोकम्॥ २७॥ पहलेके चारों इन्द्र बोले—भगवान्! हम आपकी आज्ञाके अनुसार देवलोकसे मनुष्यलोकमें जायेंगे, जहाँ दुर्लभ मोक्षका साधन भी सुलभ होता है। परंतु वहाँ हमें धर्म, वायु, इन्द्र और दोनों अश्विनीकुमार—ये ही देवता माताके गर्भमें स्थापित करें। तदनन्तर हम दिव्यास्त्रोंद्वारा मानव-वीरोंसे युद्ध करके पुनः इन्द्रलोकमें चले आयेंगे॥ २७॥

व्यास उवाच

एतच्छ्रुत्वा वज्रपाणिर्वचस्तु देवश्रेष्ठं पुनरेवेदमह। वीर्येणाहं पुरुषं कार्यहेतो- र्दद्यामेषां पञ्चमं मत्प्रसूतम्॥ २८॥ विश्वभुग् भूतधामा च शिबिरिन्द्रः प्रतापवान्। शान्तिश्चतुर्थस्तेषां वै तेजस्वी पञ्चमः स्मृतः॥ २९॥ व्यासजी कहते हैं—राजन्! पूर्ववर्ती इन्द्रोंका यह वचन सुनकर वज्रधारी इन्द्रने पुनः देवश्रेष्ठ महादेवजीसे इस प्रकार कहा—'भगवन्! मैं अपने वीर्यसे अपने ही अंशभूत पुरुषको देवताओंके कार्यके लिये समर्पित करूँगा, जो इन चारोंके साथ पाँचवाँ होगा। उसे मैं स्वयं ही उत्पन्न करूँगा। विश्वभुक्, भूतधामा, प्रतापी इन्द्र शिबि, चौथे शान्ति और पाँचवें तेजस्वी—ये ही उन पाँचोंके नाम हैं॥ २८-२९॥

तेषां कामं भगवानुग्रधन्वा प्रादादिष्टं संनिसर्गाद् यथोक्तम्। तां चाप्येषां योषितं लोककान्तां श्रियं भार्यां व्यदधान्मानुषेषु॥ ३०॥ उग्र धनुष धारण करनेवाले भगवान् रुद्रने उन सबको उनकी अभीष्ट कामना पूर्ण होनेका वरदान दिया, जिसे वे अपने साधुस्वभावके कारण भगवान्‌के सामने प्रकट कर चुके थे। साथ ही उस लोककमनीया युवती स्त्रीको, जो स्वर्गलोककी लक्ष्मी थी, मनुष्यलोकमें उनकी पत्नी निश्चित की॥ ३०॥

तैरेव सार्धं तु ततः स देवो जगाम नारायणमप्रमेयम्। अनन्तमव्यक्तमजं पुराणं सनातनं विश्वमनन्तरूपम्॥ ३१॥