महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपूर्वोक्त आदेश देकर स्वयं तक्षशिला जीतनेके लिये चले गये और उस प्रदेशको अपने अधिकारमें कर लिया ।। २० ।।
एतस्मिन्नन्तरे कश्चिदृषिर्धौम्यो नामायोदस्तस्य शिष्यास्त्रयो बभूवुरुपमन्युरारुणिर्वेदश्चेति ।। २१ ।।
(गुरुकी आज्ञाका किस प्रकार पालन करना चाहिये, इस विषयमें आगेका प्रसंग कहा जाता है—) इन्हीं दिनों आयोदधौम्य नामसे प्रसिद्ध एक महर्षि थे। उनके तीन शिष्य हुए—उपमन्यु, आरुणि पांचाल तथा वेद ।। २१ ।।
स एकं शिष्यमारुणिं पाञ्चाल्यं प्रेषयामास गच्छ केदारखण्डं बधानेति ।। २२ ।।
एक दिन उपाध्यायने अपने एक शिष्य पांचालदेशवासी आरुणिको खेतपर भेजा और कहा—‘वत्स! जाओ, क्यारियोंकी टूटी हुई मेड़ बाँध दो’ ।। २२ ।।
स उपाध्यायेन संदिष्ट आरुणिः पाञ्चाल्यस्तत्र गत्वा तत् केदारखण्डं बद्धुं नाशक्नत् । स क्लिश्यमानोऽपश्यदुपायं भवत्वेवं करिष्यामि ।। २३ ।।
उपाध्यायके इस प्रकार आदेश देनेपर पांचालदेशवासी आरुणि वहाँ जाकर उस धानकी क्यारीकी मेड़ बाँधने लगा; परंतु बाँध न सका। मेड़ बाँधनेके प्रयत्नमें ही परिश्रम करते-करते उसे एक उपाय सूझ गया और वह मन-ही-मन बोल उठा—‘अच्छा; ऐसा ही करूँ’ ।। २३ ।।
स तत्र संविवेश केदारखण्डे शयाने च तथा तस्मिंस्तदुदकं तस्थौ ।। २४ ।।
वह क्यारीकी टूटी हुई मेड़की जगह स्वयं ही लेट गया। उसके लेट जानेपर वहाँका बहता हुआ जल रुक गया ।। २४ ।।
ततः कदाचिदुपाध्याय आयोदो धौम्यः शिष्यानपृच्छत् क्व आरुणिः पाञ्चाल्यो गत इति ।। २५ ।।
फिर कुछ कालके पश्चात् उपाध्याय आयोदधौम्यने अपने शिष्योंसे पूछा—‘पांचालनिवासी आरुणि कहाँ चला गया?’ ।। २५ ।।
ते तं प्रत्यूचुर्भगवंस्त्वयैव प्रेषितो गच्छ केदारखण्डं बधानेति । स एवमुक्तस्ताञ्छिष्यान् प्रत्युवाच तस्मात् तत्र सर्वे गच्छामो यत्र स गत इति ।। २६ ।।
शिष्योंने उत्तर दिया—‘भगवन्! आपनेही तो उसे यह कहकर भेजा था कि ‘जाओ, क्यारीकी टूटी हुई मेड़ बाँध दो।’ शिष्योंके ऐसा कहनेपर उपाध्यायने उनसे कहा—‘तो चलो, हम सब लोग वहीं चलें, जहाँ आरुणि गया है’ ।। २६ ।।
स तत्र गत्वा तस्याह्वानाय शब्दं चकार । भो आरुणे पाञ्चाल्य क्वासि वत्सैहीति ।। २७ ।।
वहाँ जाकर उपाध्यायने उसे आनेके लिये आवाज दी—‘पांचालनिवासी आरुणि! कहाँ हो वत्स! यहाँ आओ’ ।। २७ ।।