भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 1380

यदि साक्षात् शंकरने ऐसा विधान किया है तो यह धर्म हो या अधर्म, इसमें मेरा कोई अपराध नहीं है। ये पाण्डवलोग विधिपूर्वक प्रसन्नतासे इसका पाणिग्रहण करें; विधाताने ही कृष्णाको इन पाण्डवोंकी पत्नी बनाया है ।। ४ ।।

वैशम्पायन उवाच

ततोऽब्रवीद् भगवान् धर्मराज- मद्यैव पुण्याहमृत वः पाण्डवेय । अद्य पौष्यं योगमुपैति चन्द्रमाः पाणिं कृष्णायास्त्वं गृहाणाद्य पूर्वम् ।। ५ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर भगवान् व्यासने धर्मराज युधिष्ठिरसे कहा—'पाण्डुनन्दन! आज ही तुम लोगोंके लिये पुण्य-दिवस है। आज चन्द्रमा भरण-पोषणकारक पुष्य नक्षत्रपर जा रहे हैं; इसलिये आज पहले तुम्हीं कृष्णाका पाणिग्रहण करो' ।। ५ ।।

ततो राजा यज्ञसेनः सपुत्रो जन्यार्थमुक्तं बहु तत् तदग्र्यम् । समानयामास सुतां च कृष्णा- माप्लाव्य रत्नैर्बहुभिर्विभूष्य ।। ६ ।। व्यासजीका यह आदेश सुनकर पुत्रोंसहित राजा द्रुपदने वर-वधूके लिये कथित समस्त उत्तम वस्तुओंको मँगवाया और अपनी पुत्री कृष्णाको स्नान कराकर बहुत-से रत्नमय आभूषणोंद्वारा विभूषित किया ।। ६ ।।

ततस्तु सर्वे सुहृदो नृपस्य समाजग्मुः सहिता मन्त्रिणश्च । द्रष्टुं विवाहं परमप्रतीता द्विजाश्च पौराश्च यथा प्रधानाः ।। ७ ।। तत्पश्चात् राजाके सभी सुहृद्-सम्बन्धी, मन्त्री, ब्राह्मण और पुरवासी अत्यन्त प्रसन्न हो विवाह देखनेके लिये आये और बड़ोंको आगे करके बैठे ।। ७ ।।

ततोऽस्य वेश्माग्र्यजनोपशोभितं विस्तीर्णपद्मोत्पलभूषिताजिरम् । बलौघरत्नौघविचित्रमाबभौ नभो यथा निर्मलतारकान्वितम् ।। ८ ।। तदनन्तर राजा द्रुपदका वह भवन श्रेष्ठ पुरुषोंसे सुशोभित होने लगा। उसके आँगनको विस्तृत कमल और उत्पल आदिसे सजाया गया था। वहाँ एक ओर सेनाएँ खड़ी थीं और

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