महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1382, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंअहन्यहन्युत्तमरूपधारिणो महारथाः कौरववंशवर्धनाः ॥ १३ ॥ इसी क्रमसे कौरव-कुलकी वृद्धि करनेवाले, उत्तम शोभा धारण करनेवाले महारथी राजकुमार पाण्डवोंने एक-एक दिन परम सुन्दरी द्रौपदीका पाणिग्रहण किया ॥ १३ ॥ इदं च तत्राद्भुतरूपमुत्तमं जगाद देवर्षिरतीतमानुषम् । महानुभावा किल सा सुमध्यमा बभूव कन्यैव गते गतेऽहनि ॥ १४ ॥ देवर्षिने वहाँ घटित हुई इस अद्भुत, उत्तम एवं अलौकिक घटनाका वर्णन किया है कि सुन्दर कटिप्रदेशवाली महानुभावा द्रौपदी प्रतिवार विवाहके दूसरे दिन कन्याभावको ही प्राप्त हो जाती थी ॥ १४ ॥ कृते विवाहे द्रुपदो धनं ददौ महारथेभ्यो बहुरूपमुत्तमम् । शतं रथानां वरहेममालिनां चतुर्युजां हेमखलीनमालिनाम् ॥ १५ ॥ विवाह-कार्य सम्पन्न हो जानेपर द्रुपदने महारथी पाण्डवोंको दहेजमें बहुत-सा धन और नाना प्रकारकी उत्तम वस्तुएँ समर्पित कीं। सुन्दर सुवर्णकी मालाओं और सुवर्णजटित जुओंसे सुशोभित सौ रथ प्रदान किये, जिनमें चार-चार घोड़े जुते हुए थे ॥ १५ ॥ शतं गजानामपि पद्मिनां तथा शतं गिरीणामिव हेमशृङ्गिणाम् । तथैव दासीशतमग्रयौवनं महार्हवेषाभरणाम्बरस्रजम् ॥ १६ ॥ पद्म आदि उत्तम लक्षणोंसे युक्त सौ हाथी तथा पर्वतोंके समान ऊँचे और सुनहरे हौदोंसे सुशोभित सौ हाथी और (साथ ही) बहुमूल्य शृंगार-सामग्री, वस्त्राभूषण एवं हार धारण करनेवाली एक सौ नवयौवना दासियाँ भी भेंट कीं ॥ १६ ॥ पृथक् पृथग् दिव्यदृशां पुनर्ददौ तदा धनं सौमकिरग्निसाक्षिकम् । तथैव वस्त्राणि विभूषणानि प्रभावयुक्तानि महानुभावः ॥ १७ ॥ सोमकवंशमें उत्पन्न महानुभाव राजा द्रुपदने इस प्रकार अग्निको साक्षी बनाकर प्रत्येक सुन्दर दृष्टिवाले पाण्डवोंके लिये अलग-अलग प्रचुर धन तथा प्रभुत्व-सूचक बहुमूल्य वस्त्र और आभूषण अर्पित किये ॥ १७ ॥ कृते विवाहे च ततस्तु पाण्डवाः