भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1384

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अष्टनवत्यधिकशततमोऽध्यायः

कुन्तीका द्रौपदीको उपदेश और आशीर्वाद तथा भगवान् श्रीकृष्णका पाण्डवोंके लिये उपहार भेजना

वैशम्पायन उवाच

पाण्डवैः सह संयोगं गतस्य द्रुपदस्य ह ।
न बभूव भयं किंचिद् देवेभ्योऽपि कथंचन ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! पाण्डवोंसे सम्बन्ध हो जानेपर राजा द्रुपदको देवताओंसे भी किसी प्रकारका कुछ भी भय नहीं रहा, फिर मनुष्योंसे तो हो ही कैसे सकता था ॥ १ ॥

कुन्तीमासाद्य ता नार्यो द्रुपदस्य महात्मनः ।
नाम संकीर्तयन्त्योऽस्या जग्मुः पादौ स्वमूर्धभिः ॥ २ ॥
महात्मा द्रुपदके कुटुम्बकी स्त्रियाँ कुन्तीके पास आकर अपने नाम ले-लेकर उनके चरणोंमें मस्तक नवाकर प्रणाम करने लगीं ॥ २ ॥

कृष्णा च क्षौमसंवीता कृतकौतुकमङ्गला ।
कृताभिवादना श्वश्र्वास्तस्थौ प्रह्वा कृताञ्जलिः ॥ ३ ॥
कृष्णा भी रेशमी साड़ी पहने मांगलिक कार्य सम्पन्न करनेके पश्चात् सासके चरणोंमें प्रणाम करके उनके सामने हाथ जोड़ विनीतभावसे खड़ी हुई ॥ ३ ॥

रूपलक्षणसम्पन्नां शीलाचारसमन्विताम् ।
द्रौपदीमवदत् प्रेम्णा पृथाऽऽशीर्वचनं स्नुषाम् ॥ ४ ॥
सुन्दर रूप तथा उत्तम लक्षणोंसे सम्पन्न, शील और सदाचारसे सुशोभित अपनी बहू द्रौपदीको सामने देख कुन्तीदेवी उसे प्रेमपूर्वक आशीर्वाद देती हुई बोलीं— ॥ ४ ॥

यथेन्द्राणी हरिहये स्वाहा चैव विभावसौ ।
रोहिणी च यथा सोमे दमयन्ती यथा नले ॥ ५ ॥
यथा वैश्रवणे भद्रा वसिष्ठे चाप्यरुन्धती ।
यथा नारायणे लक्ष्मीस्तथा त्वं भव भर्तृषु ॥ ६ ॥
‘बेटी! जैसे इन्द्राणी इन्द्रमें, स्वाहा अग्निमें, रोहिणी चन्द्रमामें, दमयन्ती नलमें, भद्रा कुबेरमें, अरुन्धती वसिष्ठमें तथा लक्ष्मी भगवान् नारायणमें भक्ति-भाव एवं प्रेम रखती हैं, उसी प्रकार तुम भी अपने पतियोंमें अनुरक्त रहो ॥ ५-६ ॥