महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतेषां सम्बन्धिनश्चान्ये बहवश्च महाबलाः ॥ २४ ॥ वे वीर पाण्डव कुशलपूर्वक जीवित बच गये हैं और उन्हें मित्रोंका सहयोग भी प्राप्त हो गया है। इतना ही नहीं और भी बहुत-से महाबली नरेश उनके सम्बन्धी होते जा रहे हैं ॥ २४ ॥
को हि द्रुपदमासाद्य मित्रं क्षत्तः सबान्धवम् । न बुभूषेद् भवेनार्थी गतश्रीरपि पार्थिवः ॥ २५ ॥ विदुर! कौन ऐसा राजा है, जिसकी सम्पत्ति नष्ट हो जानेपर भी बन्धु-बान्धवोंसहित द्रुपदको मित्रके रूपमें पाकर जीना नहीं चाहेगा ॥ २५ ॥
वैशम्पायन उवाच
तं तथा भाषमाणं तु विदुरः प्रत्यभाषत । नित्यं भवतु ते बुद्धिरेषा राजञ्छतं समाः । इत्युक्त्वा प्रययौ राजन् विदुरः स्वं निवेशनम् ॥ २६ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! ऐसी बातें कहनेवाले राजा धृतराष्ट्रसे विदुर (इस प्रकार) बोले—'महाराज! सौ वर्षोंतक आपकी बुद्धि ऐसी ही बनी रहे।' राजन्! इतना कहकर विदुरजी अपने घर चले गये ॥ २६ ॥
ततो दुर्योधनश्चापि राधेयश्च विशाम्पते । धृतराष्ट्रमुपागम्य वचोऽब्रूतामिदं तदा ॥ २७ ॥ जनमेजय! तदनन्तर दुर्योधन और कर्णने धृतराष्ट्रके पास आकर यह बात कही— ॥ २७ ॥
संनिधौ विदुरस्य त्वां दोषं वक्तुं न शक्नुवः । विविक्तमिति वक्ष्यावः किं तवेदं चिकीर्षितम् ॥ २८ ॥ सपत्नवृद्धिं यत् तात मन्यसे वृद्धिमात्मनः । अभिष्टौषि च यत् क्षत्तुः समीपे द्विषतां वर ॥ २९ ॥ 'महाराज! विदुरके समीप हम आपसे आपका कोई दोष नहीं बता सकते। इस समय एकान्त है, इसलिये कहते हैं। आप यह क्या करना चाहते हैं? पूज्य पिताजी! आप तो शत्रुओंकी उन्नतिको ही अपनी उन्नति मानने लगे हैं और विदुरजीके निकट हमारे वैरियोंकी ही भूरि-भूरि प्रशंसा करते हैं ॥ २८-२९ ॥
अन्यस्मिन् नृप कर्तव्ये त्वमन्यत् कुरुषेऽनघ । तेषां बलविघातो हि कर्तव्यस्तात नित्यशः ॥ ३० ॥ निष्पाप नरेश! हमें करना तो कुछ और चाहिये, किंतु आप करते कुछ और (ही) हैं। तात! हमारे लिये तो यही उचित है कि हम सदा पाण्डवोंकी शक्तिका विनाश करते रहें ॥ ३० ॥