महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकृष्णाको भी उनकी ओरसे फूट डालकर विलग करना असम्भव है; क्योंकि जब पाण्डवलोग भिक्षाभोजी होनेके कारण दीन-हीन थे, उस अवस्थामें कृष्णाने उनका वरण किया है; अब तो वे सम्पत्तिशाली होकर स्वच्छ एवं सुन्दर वेषमें रहते हैं, अब वह क्यों उनकी ओरसे विरक्त होगी? ॥ ७ ॥
ईप्सितश्च गुणः स्त्रीणामेकस्या बहुभर्तृता । तं च प्राप्तवती कृष्णा न सा भेदयितुं क्षमा ॥ ८ ॥ प्रायः स्त्रियोंका यह अभीष्ट गुण है कि एक स्त्रीमें अनेक पुरुषोंसे सम्बन्ध स्थापित करनेकी रुचि हो। पाण्डवोंके साथ रहनेमें कृष्णाको यह लाभ स्वतः प्राप्त है; अतः उसके मनमें भेद नहीं उत्पन्न किया जा सकता ॥ ८ ॥
आर्यव्रतश्च पाञ्चाल्यो न स राजा धनप्रियः । न संत्यक्ष्यति कौन्तेयान् राज्यदानैरपि ध्रुवम् ॥ ९ ॥ पांचालराज द्रुपद श्रेष्ठ व्रतका पालन करनेवाले हैं। वे धनके लोभी नहीं हैं। अतः तुम अपना सारा राज्य दे दो, तो भी यह निश्चय है कि वे कुन्ती-पुत्रोंका परित्याग नहीं करेंगे ॥ ९ ॥
यथास्य पुत्रो गुणवाननुरक्तश्च पाण्डवान् । तस्मान्नोपायसाध्यांस्तानहं मन्ये कथंचन ॥ १० ॥ इसी प्रकार उनका पुत्र धृष्टद्युम्न भी गुणवान् तथा पाण्डवोंका प्रेमी है। अतः मैं उन्हें पूर्वोक्त उपायोंसे वशमें करनेयोग्य कदापि नहीं मान सकता ॥ १० ॥
इदं त्वद्य क्षमं कर्तुमस्माकं पुरुषर्षभ । यावन्न कृतमूलास्ते पाण्डवेया विशाम्पते ॥ ११ ॥ तावत् प्रहरणीयास्ते तत् तुभ्यं तात रोचताम् । अस्मत्पक्षो महान् यावद् यावत् पाञ्चालको लघुः । तावत् प्रहरणं तेषां क्रियतां मा विचारय ॥ १२ ॥ 'राजन्! इस समय हमारे लिये एक ही उपाय काममें लानेयोग्य है; वे पुरुषश्रेष्ठ पाण्डव जबतक अपनी जड़ नहीं जमा लेते, तभीतक उनपर प्रहार करना चाहिये। इसीसे वे काबूमें आ सकते हैं।' तात! मैं समझता हूँ, तुम्हें भी यह राय पसंद होगी। जबतक हमारा पक्ष बढ़ा-चढ़ा है और जबतक पांचालराजका बल हमसे कम है, तभीतक उनपर आक्रमण कर दिया जाय। इसमें दूसरा कुछ विचार न करो ॥ ११-१२ ॥
वाहनानि प्रभूतानि मित्राणि च कुलानि च । यावन्न तेषां गान्धारे तावद् विक्रम पार्थिव ॥ १३ ॥ राजन्! गान्धारीनन्दन! जबतक पाण्डवोंके पास बहुत-से वाहन, मित्र और कुटुम्बी नहीं हो जाते, तभीतक तुम उनके ऊपर पराक्रम कर लो ॥ १३ ॥
यावच्च राजा पाञ्चाल्यो नोद्यमे कुरुते मनः ।