भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1411

हिरण्मयानि शुभ्राणि बहून्याभरणानि च । वचनात् तव राजेन्द्र द्रौपद्याः सम्प्रयच्छतु ॥ ७ ॥ राजेन्द्र! वह आपकी आज्ञासे द्रौपदीके लिये बहुत-से सुन्दर सुवर्णमय आभूषण अर्पित करे ॥ ७ ॥

तथा द्रुपदपुत्राणां सर्वेषां भरतर्षभ । पाण्डवानां च सर्वेषां कुन्त्या युक्तानि यानि च ॥ ८ ॥ भरतश्रेष्ठ! द्रुपदके सभी पुत्रों, समस्त पाण्डवों और कुन्तीके लिये भी जो उपयुक्त आभूषण आदि हों, उन्हें भी वह अर्पित करे ॥ ८ ॥

एवं सान्त्वसमायुक्तं द्रुपदं पाण्डवैः सह । उक्त्वा सोऽनन्तरं ब्रूयात् तेषामागमनं प्रति ॥ ९ ॥ इस प्रकार (उपहार देनेके पश्चात्) पाण्डवोंसहित द्रुपदसे सान्त्वनापूर्ण वचन कहकर अन्तमें वह पाण्डवोंके हस्तिनापुरमें आनेके विषयमें प्रस्ताव करे ॥ ९ ॥

अनुज्ञातेषु वीरेषु बलं गच्छतु शोभनम् । दुःशासनों विकर्णश्चाप्यानेतुं पाण्डवानिह ॥ १० ॥ जब द्रुपदकी ओरसे पाण्डववीरोंको यहाँ आनेकी अनुमति मिल जाय, तब एक अच्छी-सी सेना साथ ले दुःशासन और विकर्ण पाण्डवोंको यहाँ ले आनेके लिये जायें ॥ १० ॥

ततस्ते पाण्डवाः श्रेष्ठाः पूज्यमानाः सदा त्वया । प्रकृतीनामनुमते पदे स्थास्यन्ति पैतृके ॥ ११ ॥ यहाँ आनेके पश्चात् वे श्रेष्ठ पाण्डव आपके द्वारा सदा आदर-सत्कार प्राप्त करते हुए प्रजाकी इच्छाके अनुसार वे अपने पैतृक राज्यपर प्रतिष्ठित होंगे ॥ ११ ॥

एतत् तव महाराज पुत्रेषु तेषु चैव हि । वृत्तमौपयिकं मन्ये भीष्मेण सह भारत ॥ १२ ॥ भरतवंशी महाराज! आपको अपने पुत्रों और पाण्डवोंके प्रति उपर्युक्त व्यवहार ही करना चाहिये—भीष्मजीके साथ मैं भी यही उचित समझता हूँ ॥ १२ ॥

कर्ण उवाच

योजितावर्थमानाभ्यां सर्वकार्येष्वनन्तरौ । न मन्त्रयेतां त्वच्छ्रेयः किमद्भुततरं ततः ॥ १३ ॥ कर्ण बोला—महाराज! भीष्मजी और द्रोणाचार्यको आपकी ओरसे सदा धन और सम्मान प्राप्त होता रहता है। इन्हें आप अपना अन्तरंग सुहृद् समझकर सभी कार्योंमें इनकी सलाह लेते हैं। फिर भी यदि ये आपके भलेकी सलाह न दें तो इससे बढ़कर आश्चर्यकी बात और क्या हो सकती है? ॥ १३ ॥

दुष्टेन मनसा यो वै प्रच्छन्नेनान्तरात्मना ।