महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउनके पिताका राज्य होनेके कारण वे ही धर्मपूर्वक इस राज्यके उत्तराधिकारी हैं, इस बातकी ओर ध्यान देकर आप उनके साथ उत्तम बर्ताव कीजिये ॥ २१-२२ ॥ इदं निर्दिष्टमयशः पुरोचनकृतं महत् । तेषामनुग्रहेणाद्य राजन् प्रक्षालयात्मानः ॥ २३ ॥ राजन्! पुरोचनके हाथों जो कुछ कराया गया, उससे आपका बहुत बड़ा अपयश सब ओर फैल गया है। अपने उस कलंकको आज आप पाण्डवोंपर अनुग्रह करके धो डालिये ॥ २३ ॥ तेषामनुग्रहश्चायं सर्वेषां चैव नः कुले । जीवितं च परं श्रेयः क्षत्रस्य च विवर्धनम् ॥ २४ ॥ पाण्डवोंपर किया हुआ यह अनुग्रह हमारे कुलके सभी लोगोंके जीवनका रक्षक, परम हितकारक और सम्पूर्ण क्षत्रिय जातिका अभ्युदय करनेवाला होगा ॥ २४ ॥ द्रुपदोऽपि महान् राजा कृतवैरश्च नः पुरा । तस्य संग्रहणं राजन् स्वपक्षस्य विवर्धनम् ॥ २५ ॥ राजन्! द्रुपद भी बहुत बड़े राजा हैं और पहले हमारे साथ उनका वैर भी हो चुका है। अतः मित्रके रूपमें उनका संग्रह हमारे अपने पक्षकी वृद्धिका कारण होगा ॥ २५ ॥ बलवन्तश्च दाशार्हा बहवश्च विशाम्पते । यतः कृष्णस्ततः सर्वे यतः कृष्णस्ततो जयः ॥ २६ ॥ पृथ्वीपते! यदुवंशियोंकी संख्या बहुत है और वे बलवान् भी हैं। जिस ओर श्रीकृष्ण रहेंगे, उधर ही वे सभी रहेंगे। इसलिये जिस पक्षमें श्रीकृष्ण होंगे, उस पक्षकी विजय अवश्य होगी ॥ २६ ॥ यच्च साम्नैव शक्येत कार्यं साधयितुं नृप । को दैवशप्तस्तत् कार्यं विग्रहेण समाचरेत् ॥ २७ ॥ महाराज! जो कार्य शान्तिपूर्वक समझाने-बुझानेसे ही सिद्ध हो जा सकता है, उसीको कौन दैवका मारा हुआ मनुष्य युद्धके द्वारा सिद्ध करेगा ॥ २७ ॥ श्रुत्वा च जीवतः पार्थान् पौरजानपदा जनाः । बलवद् दर्शने हृष्टास्तेषां राजन् प्रियं कुरु ॥ २८ ॥ कुन्तीके पुत्रोंको जीवित सुनकर नगर और जनपदके सभी लोग उन्हें देखनेके लिये अत्यन्त उत्सुक हो रहे हैं। राजन्! उन सबका प्रिय कीजिये ॥ २८ ॥ दुर्योधनश्च कर्णश्च शकुनिश्चापि सौबलः । अधर्मयुक्ता दुष्प्रज्ञा बाला मैषां वचः कृथाः ॥ २९ ॥ दुर्योधन, कर्ण और सुबलपुत्र शकुनि—ये अधर्मपरायण, खोटी बुद्धिवाले और मूर्ख हैं; अतः इनका कहना न मानिये ॥ २९ ॥ उक्तमेतत् पुरा राजन् मया गुणवतस्तव ।