महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनिवास करते थे। महाबाहो! वहीं समस्त पौरव नरेशोंकी राजधानी थी। आगे चलकर मुनियोंने बुधपुत्रके लोभसे खाण्डवप्रस्थको नष्ट कर दिया था। इसलिये तुम खाण्डवप्रस्थ नगरको पुनः बसाओ और अपने राष्ट्रकी वृद्धि करो। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र सबने तुम्हारे साथ वहाँ जानेका निश्चय किया है। तुममें भक्ति रखनेके कारण दूसरे लोग भी उस सुन्दर नगरका आश्रय लेंगे। निष्पाप कुन्तीकुमार! वह नगर तथा राष्ट्र समृद्धिशाली और धन-धान्यसे सम्पन्न है। अतः तुम भाइयोंसहित वहीं जाओ।
वैशम्पायन उवाच
प्रतिगृह्य तु तद् वाक्यं नृपं सर्वे प्रणम्य च ॥ २६ ॥
प्रतस्थिरे ततो घोरं वनं तन्मनुजर्षभाः ।
अर्धं राज्यस्य सम्प्राप्य खाण्डवप्रस्थमाविशन् ॥ २७ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! राजा धृतराष्ट्रकी बात मानकर पाण्डवोंने उन्हें प्रणाम किया और आधा राज्य पाकर वे खाण्डवप्रस्थकी ओर चल दिये, जो भयंकर वनके रूपमें था। धीरे-धीरे वे खाण्डवप्रस्थमें जा पहुँचे ॥ २६-२७ ॥
ततस्ते पाण्डवास्तत्र गत्वा कृष्णपुरोगमाः ।
मण्डयांचक्रिरे तद् वै परं स्वर्गवदच्युताः ॥ २८ ॥
तदनन्तर अपनी मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले पाण्डवोंने श्रीकृष्णसहित वहाँ जाकर उस स्थानको उत्तम स्वर्गलोककी भाँति शोभायमान कर दिया ॥ २८ ॥
(वासुदेवो जगन्नाथश्चिन्तयामास वासवम् ।
महेन्द्रश्चिन्तितो राजन् विश्वकर्माणमादिशत् ॥
फिर जगदीश्वर भगवान् वासुदेवने देवराज इन्द्रका चिन्तन किया। राजन्! उनके चिन्तन करनेपर इन्द्रदेवने (उनके मनकी बात जानकर) विश्वकर्माको इस प्रकार आज्ञा दी।
महेन्द्र उवाच
विश्वकर्मन् महाप्राज्ञ अद्यप्रभृति तत् पुरम् ।
इन्द्रप्रस्थमिति ख्यातं दिव्यं रम्यं भविष्यति ॥
**इन्द्र बोले—**विश्वकर्मन्! महामते! (आप जाकर खाण्डवप्रस्थ नगरका निर्माण करें।) आजसे वह दिव्य और रमणीय नगर इन्द्रप्रस्थके नामसे विख्यात होगा।
वैशम्पायन उवाच
महेन्द्रशासनाद् गत्वा विश्वकर्मा तु केशवम् ।
प्रणम्य प्रणिपातार्हं किं करोमीत्यभाषत ॥
वासुदेवस्तु तच्छ्रुत्वा विश्वकर्माणमूचिवान् ।