महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजो दो जीभोंवाले साँपोंके समान जान पड़ती थीं। इन सबके द्वारा उस नगरकी सुरक्षा की गयी थी ॥ ३३ ॥
तल्पैश्चाभ्यासिकैर्युक्तं शुशुभे योधरक्षितम् ।
तीक्ष्णाङ्कुशशतघ्नीभिर्यन्त्रजालैश्च शोभितम् ॥ ३४ ॥
जिनमें अस्त्र-शस्त्रोंका अभ्यास किया जाता था, ऐसी अनेक अट्टालिकाओंसे युक्त और योद्धाओंसे सुरक्षित उस नगरकी शोभा देखते ही बनती थी। तीखे अंकुशों (बर्छों), शतघ्नियों (तोपों) और अन्यान्य युद्धसम्बन्धी यन्त्रोंके जालसे वह नगर शोभा पा रहा था ॥ ३४ ॥
आयसैश्च महाचक्रैः शुशुभे तत् पुरोत्तमम् ।
सुविभक्तमहारथ्यं देवताबाधवर्जितम् ॥ ३५ ॥
लोहेके बने हुए महान् चक्रोंद्वारा उस उत्तम नगरकी अवर्णनीय शोभा हो रही थी। वहाँ विभागपूर्वक विभिन्न स्थानोंमें जानेके लिये विशाल एवं चौड़ी सड़कें बनी हुई थीं। उस नगरमें दैवी आपत्तिका नाम नहीं था ॥ ३५ ॥
विरोचमानं विविधैः पाण्डुरैर्भवनोत्तमैः ।
तत् त्रिविष्टपसंकाशमिन्द्रप्रस्थं व्यरोचत ॥ ३६ ॥
अनेक प्रकारके श्रेष्ठ एवं शुभ्र सदनोंसे शोभित वह नगर स्वर्गलोकके समान प्रकाशित हो रहा था। उसका नाम था इन्द्रप्रस्थ ॥ ३६ ॥
मेघवृन्दमिवाकाशे विद्धं विद्युत्समावृतम् ।
तत्र रम्ये शिवे देशे कौरव्यस्य निवेशनम् ॥ ३७ ॥
इन्द्रप्रस्थके रमणीय एवं शुभ प्रदेशमें कुरुराज युधिष्ठिरका सुन्दर राजभवन बना हुआ था, जो आकाशमें विद्युत्की प्रभासे व्याप्त मेघमण्डलकी भाँति देदीप्यमान था ॥ ३७ ॥
शुशुभे धनसम्पूर्णं धनाध्यक्षक्षयोपमम् ।
तत्रागच्छन् द्विजा राजन् सर्ववेदविदां वराः ॥ ३८ ॥
निवासं रोचयन्ति स्म सर्वभाषाविदस्तथा ।
वणिजश्चाप्ययुस्तत्र नानादिग्भ्यो धनार्थिनः ॥ ३९ ॥
अनन्त धनराशिसे परिपूर्ण होनेके कारण वह भवन धनाध्यक्ष कुबेरके निवासस्थानकी समानता करता था। राजन्! सम्पूर्ण वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ ब्राह्मण उस नगरमें निवास करनेके लिये आये, जो सम्पूर्ण भाषाओंके जानकार थे। उन सबको वहाँका रहना बहुत पसंद आया। अनेक दिशाओंसे धनोपार्जनकी इच्छावाले वणिक् भी उस नगरमें आये ॥ ३८-३९ ॥
सर्वशिल्पविदस्तत्र वासायाभ्यागमंस्तदा ।
उद्यानानि च रम्याणि नगरस्य समन्ततः ॥ ४० ॥