महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभगवान् नारदजी पधारे हैं। यह सुनकर द्रौपदी भी पवित्र एवं एकाग्रचित हो उसी स्थानपर गयी, जहाँ पाण्डवोंके साथ नारदजी विराजमान थे। धर्मका आचरण करनेवाली कृष्णा देवर्षिके चरणोंमें प्रणाम करके अपने अंगोंको ढके हुए हाथ जोड़कर खड़ी हो गयी। धर्मात्मा एवं सत्यवादी मुनिश्रेष्ठ भगवान् नारदने राजकुमारी द्रौपदीको नाना प्रकारके आशीर्वाद देकर उस सती-साध्वी देवीसे कहा, 'अब तुम भीतर जाओ।' कृष्णाके चले जानेपर भगवान् देवर्षिने एकान्तमें युधिष्ठिर आदि समस्त पाण्डवोंसे कहा ॥ १२-१७ ॥
नारद उवाच
पाञ्चाली भवतामेका धर्मपत्नी यशस्विनी । यथा वो नात्र भेदः स्यात् तथा नीतिर्विधीयताम् ॥ १८ ॥ **नारदजी बोले—**पाण्डवो! यशस्विनी पांचाली तुम सब लोगोंकी एक ही धर्मपत्नी है; अतः तुमलोग ऐसी नीति बना लो, जिससे तुमलोगोंमें कभी परस्पर फूट न हो ॥ १८ ॥ सुन्दोपसुन्दौ हि पुरा भ्रातरौ सहितावुभौ । आस्तामवध्यावन्येषां त्रिषु लोकेषु विश्रुतौ ॥ १९ ॥ पहलेकी बात है, सुन्द और उपसुन्द नामक दो असुर भाई-भाई थे। वे सदा साथ रहते थे एवं दूसरेके लिये अवध्य थे (केवल आपसमें ही लड़कर वे मर सकते थे)। उनकी तीनों लोकोंमें बड़ी ख्याति थी ॥ १९ ॥ एकराज्यावेकगृहावेकशय्यासनाशनौ । तिलोत्तमायास्तौ हेतोरन्योन्यमभिजघ्नतुः ॥ २० ॥ उनका एक ही राज्य था और एक ही घर। वे एक ही शय्यापर सोते, एक ही आसनपर बैठते और एक साथ ही भोजन करते थे। इस प्रकार आपसमें अटूट प्रेम होनेपर भी तिलोत्तमा अप्सराके लिये लड़कर उन्होंने एक-दूसरेको मार डाला ॥ २० ॥