भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 1465

सा विग्रहवतीव श्रीः कामरूपा वपुष्मती ।
जहार सर्वभूतानां चक्षूंषि च मनांसि च ॥ १७ ॥
वह मूर्तिमती कामरूपिणी लक्ष्मीकी भाँति समस्त प्राणियोंके नेत्रों और मनको हर लेती थी ॥ १७ ॥
तिलं तिलं समानीय रत्नानां यद् विनिर्मिता ।
तिलोत्तमेति तत् तस्या नाम चक्रे पितामहः ॥ १८ ॥
उत्तम रत्नोंका तिल-तिलभर अंश लेकर उसके अंगोंका निर्माण हुआ था, इसलिये ब्रह्माजीने उसका नाम 'तिलोत्तमा' रख दिया ॥ १८ ॥
ब्रह्माणं सा नमस्कृत्य प्राञ्जलिर्वाक्यमब्रवीत् ।
किं कार्यं मयि भूतेश येनास्म्यद्येह निर्मिता ॥ १९ ॥
तदनन्तर तिलोत्तमा ब्रह्माजीको नमस्कार करके हाथ जोड़कर बोली—'प्रजापते! मुझपर किस कार्यका भार रखा गया है? जिसके लिये आज मेरे शरीरका निर्माण किया गया है' ॥ १९ ॥

पितामह उवाच
गच्छ सुन्दोपसुन्दाभ्यामसुराभ्यां तिलोत्तमे ।
प्रार्थनीयेन रूपेण कुरु भद्रे प्रलोभनम् ॥ २० ॥
ब्रह्माजीने कहा— भद्रे तिलोत्तमे! तू सुन्द और उपसुन्द नामक असुरोंके पास जा और अपने अत्यन्त कमनीय रूपके द्वारा उनको लुभा ॥ २० ॥
त्वत्कृते दर्शनादेव रूपसम्पत्कृतेन वै ।
विरोधः स्याद् यथा ताभ्यामन्योन्येन तथा कुरु ॥ २१ ॥
तुझे देखते ही तेरे लिये—तेरी रूपसम्पत्तिके लिये उन दोनों दैत्योंमें परस्पर विरोध हो जाय, ऐसा प्रयत्न कर ॥ २१ ॥

नारद उवाच
सा तथेति प्रतिज्ञाय नमस्कृत्य पितामहम् ।
चकार मण्डलं तत्र विबुधानां प्रदक्षिणम् ॥ २२ ॥
नारदजी कहते हैं— युधिष्ठिर! तब तिलोत्तमाने वैसा ही करनेकी प्रतिज्ञा करके ब्रह्माजीके चरणोंमें प्रणाम किया। फिर वह देवमण्डलीकी परिक्रमा करने लगी ॥ २२ ॥
प्राङ्मुखो भगवानास्ते दक्षिणेन महेश्वरः ।
देवाश्चैवोत्तरेणासन् सर्वतस्त्वृषयोऽभवन् ॥ २३ ॥
ब्रह्माजीके दक्षिणभागमें भगवान् महेश्वर पूर्वाभिमुख होकर बैठे थे, उत्तरभागमें देवतालोग थे तथा ऋषि-मुनि ब्रह्माजीके चारों ओर बैठे थे ॥ २३ ॥
कुर्वत्या तु तदा तत्र मण्डलं तत् प्रदक्षिणम् ।

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