महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतब राजाने उन्हें सान्त्वना देते हुए कहा—'इस कुलमें पहले प्रभंजन नामसे प्रसिद्ध एक राजा हो गये हैं ॥ १९ ॥
अपुत्रः प्रसवेनार्थी तपस्तेपे स उत्तमम् । उग्रेण तपसा तेन देवदेवः पिनाकधृक् ॥ २० ॥ ईश्वरस्तोषितः पार्थ देवदेव उमापतिः । स तस्मै भगवान् प्रादादेकैकं प्रसवं कुले ॥ २१ ॥ 'उनके कोई पुत्र नहीं था, अतः उन्होंने पुत्रकी इच्छासे उत्तम तपस्या प्रारम्भ की। पार्थ! उन्होंने उस उग्र तपस्यासे पिनाकधारी देवाधिदेव महेश्वरको संतुष्ट कर लिया। तब देवदेवेश्वर भगवान् उमापति उन्हें वरदान देते हुए बोले—'तुम्हारे कुलमें एक-एक संतान होती जायगी' ॥ २०-२१ ॥
एकैकः प्रसवस्तस्माद् भवत्यस्मिन् कुले सदा । तेषां कुमाराः सर्वेषां पूर्वेषां मम जज्ञिरे ॥ २२ ॥ एका च मम कन्येयं कुलस्योत्पादिनी भृशम् । पुत्रो ममायमिति मे भावना पुरुषर्षभ ॥ २३ ॥ 'इस कारण हमारे इस कुलमें सदासे एक-एक संतान ही होती चली आ रही है। मेरे अन्य सभी पूर्वजोंके तो पुत्र होते आये हैं, परंतु मेरे यह एक कन्या ही हुई है। यही इस कुलकी परम्पराको चलानेवाली है। अतः भरतश्रेष्ठ! इसके प्रति मेरी यही भावना रहती है कि 'यह मेरा पुत्र है' ॥ २२-२३ ॥
पुत्रिका हेतुविधिना संज्ञिता भरतर्षभ । तस्मादेकः सुतो योऽस्यां जायते भारत त्वया ॥ २४ ॥ एतच्छुल्कं भवत्वस्याः कुलकृज्जायतामिह । एतेन समयेनेमां प्रतिगृह्णीष्व पाण्डव ॥ २५ ॥ 'यद्यपि यह पुत्री है, तो भी हेतुविधिसे (अर्थात् इससे जो प्रथम पुत्र होगा, वह मेरा ही पुत्र माना जायगा, इस हेतुसे) मैंने इसे पुत्रकी संज्ञा दे रखी है। भरतश्रेष्ठ! तुम्हारे द्वारा इसके गर्भसे जो एक पुत्र उत्पन्न हो, वह यहीं रहकर इस कुलपरम्पराका प्रवर्तक हो; इस कन्याके विवाहका यही शुल्क आपको देना होगा। पाण्डुनन्दन! इसी शर्तके अनुसार आप इसे ग्रहण करें' ॥ २४-२५ ॥
स तथेति प्रतिज्ञाय तां कन्यां प्रतिगृह्य च । उवास नगरे तस्मिंस्तिस्रः कुन्तीसुतः समाः ॥ २६ ॥ 'तथास्तु' कहकर अर्जुनने वैसा ही करनेकी प्रतिज्ञा की और उस कन्याका पाणिग्रहण करके उन्होंने तीन वर्षोंतक उसके साथ उस नगरमें निवास किया ॥ २६ ॥
तस्यां सुते समुत्पन्ने परिष्वज्य वराङ्गनाम् । आमन्त्र्य नृपतिं तं तु जगाम परिवर्तितुम् ॥ २७ ॥