भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1493

**तपस्वी बोले—**कुरुनन्दन! उन तीर्थोंमें पाँच ग्राह रहते हैं, जो नहानेवाले तपोधन ऋषियोंको जलके भीतर खींच ले जाते हैं; इसीलिये ये तीर्थ मुनियोंद्वारा त्याग दिये गये हैं॥ ७॥

वैशम्पायन उवाच

तेषां श्रुत्वा महाबाहुर्वार्यमाणस्तपोधनैः।
जगाम तानि तीर्थानि द्रष्टुं पुरुषसत्तमः॥ ८॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**उनकी बातें सुनकर कुरुश्रेष्ठ महाबाहु अर्जुन उन तपोधनोंके मना करनेपर भी उन तीर्थोंका दर्शन करनेके लिये गये॥ ८॥

ततः सौभद्रमासाद्य महर्षेस्तीर्थमुत्तमम्।
विगाह्य सहसा शूरः स्नानं चक्रे परंतपः॥ ९॥
तदनन्तर परंतप शूरवीर अर्जुन महर्षि सुभद्रके उत्तम सौभद्रतीर्थमें सहसा उतरकर स्नान करने लगे॥ ९॥

अथ तं पुरुषव्याघ्रमन्तर्जलचरो महान्।
जग्राह चरणे ग्राहः कुन्तीपुत्रं धनंजयम्॥ १०॥
इतनेमें ही जलके भीतर विचरनेवाले एक महान् ग्राहने नरश्रेष्ठ कुन्तीकुमार धनंजयका एक पैर पकड़ लिया॥ १०॥

स तमादाय कौन्तेयो विस्फुरन्तं जलेचरम्।
उदतिष्ठन्महाबाहुर्बलेन बलिनां वरः॥ ११॥
परंतु बलवानोंमें श्रेष्ठ महाबाहु कुन्तीकुमार बहुत उछल-कूद मचाते हुए उस जलचर जीवको लिये-दिये पानीसे बाहर निकल आये॥ ११॥

उत्कृष्ट एव ग्राहस्तु सोऽर्जुनेन यशस्विना।
बभूव नारी कल्याणी सर्वाभरणभूषिता॥ १२॥
यशस्वी अर्जुनद्वारा पानीके ऊपर खिंच आनेपर वह ग्राह समस्त आभूषणोंसे विभूषित एक परम सुन्दरी नारीके रूपमें परिणत हो गया॥ १२॥

दीप्यमाना श्रिया राजन् दिव्यरूपा मनोरमा।
तदद्भुतं महत् दृष्ट्वा कुन्तीपुत्रो धनंजयः॥ १३॥
तां स्त्रियं परमप्रीत इदं वचनमब्रवीत्।
का वै त्वमसि कल्याणि कुतो वासि जलेचरी॥ १४॥
किमर्थं च महत् पापमिदं कृतवती पुरा।