भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 1495

नाकम्पत महातेजाः स्थितस्तपसि निर्मले ॥ २२ ॥
परंतु वीरवर! उन्होंने किसी प्रकार भी अपने मनको हमारी ओर नहीं खिंचने दिया। वे महातेजस्वी ब्राह्मण निर्मल तपस्यामें संलग्न थे। वे उससे तनिक भी विचलित नहीं हुए ॥ २२ ॥
सोऽशपत् कुपितोऽस्मासु ब्राह्मणः क्षत्रियर्षभ ।
ग्राहभूता जले यूयं चरिष्यथ शतं समाः ॥ २३ ॥
क्षत्रियशिरोमणे! हमारी उद्दण्डतासे कुपित होकर उन ब्राह्मणने हमें शाप दे दिया—‘तुमलोग सौ वर्षोंतक जलमें ग्राह बनकर रहोगी’ ॥ २३ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वण्यर्जुनवनवासपर्वणि तीर्थग्राहविमोचने
पञ्चदशाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २१५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत अर्जुनवनवासपर्वमें तीर्थग्राहविमोचनविषयक दो सौ पंद्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २१५ ॥