भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

पृष्ठ 1498, कुल 2256 में से

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पृष्ठ 1498

**वर्गा कहती है—**भारत! तदनन्तर उन ब्राह्मणको प्रणाम और उनकी प्रदक्षिणा करके अत्यन्त दुःखी हो हम सब उस स्थानसे अन्यत्र चली आयीं और इस चिन्तामें पड़ गयीं कि कहाँ जाकर हम सब लोग रहें, जिससे थोड़े ही समयमें हमें वह मनुष्य मिल जाय, जो हमें पुनः हमारे पूर्व स्वरूपकी प्राप्ति करायेगा ।। १२-१३ ।। ता वयं चिन्तयित्वैव मुहूर्तादिव भारत । दृष्टवत्यो महाभागं देवर्षिमुत नारदम् ।। १४ ।। भरतश्रेष्ठ! हमलोग दो घड़ीसे इस प्रकार सोच-विचार कर ही रही थीं कि हमको महाभाग देवर्षि नारदजीका दर्शन प्राप्त हुआ ।। १४ ।। सम्प्रहृष्टाः स्म तं दृष्ट्वा देवर्षिममितद्युतिम् । अभिवाद्य च तं पार्थ स्थिताः स्म व्रीडिताननाः ।। १५ ।। कुन्तीनन्दन! उन अमिततेजस्वी देवर्षिको देखकर हमें बड़ा हर्ष हुआ और उन्हें प्रणाम करके हम लज्जावश सिर झुकाकर वहाँ खड़ी हो गयीं ।। १५ ।। स नोऽपृच्छद् दुःखमूलमुक्तवत्यो वयं च तम् । श्रुत्वा तत्र यथावृत्तमिदं वचनमब्रवीत् ।। १६ ।। फिर उन्होंने हमारे दुःखका कारण पूछा और हमने उनसे सब कुछ बता दिया। सारा हाल सुनकर वे इस प्रकार बोले— ।। १६ ।। दक्षिणे सागरानूपे पञ्च तीर्थानि सन्ति वै । पुण्यानि रमणीयानि तानि गच्छत मा चिरम् ।। १७ ।। ‘दक्षिण समुद्रके तटके समीप पाँच तीर्थ हैं, जो परम पुण्यजनक तथा अत्यन्त रमणीय हैं। तुम सब उन्हींमें चली जाओ, देर न करो ।। १७ ।। तत्राशु पुरुषव्याघ्रः पाण्डवेयो धनंजयः । मोक्षयिष्यति शुद्धात्मा दुःखादस्मान्न संशयः ।। १८ ।। तस्य सर्वा वयं वीर श्रुत्वा वाक्यमिहागताः । तदिदं सत्यमेवाद्य मोक्षिताहं त्वयानघ ।। १९ ।। ‘वहाँ पुरुषोंमें श्रेष्ठ शुद्धात्मा पाण्डुकुमार धनंजय शीघ्र ही पहुँचकर तुम्हें इस दुःखसे छुड़ायेंगे, इसमें संशय नहीं है।' वीर अर्जुन! नारदजीका यह वचन सुनकर हम सब सखियाँ यहीं चली आयीं। अनघ! आज सचमुच ही आपने मुझे उस शापसे मुक्त कर दिया ।। १८-१९ ।। एतास्तु मम ताः सख्यश्चतस्रोऽन्या जले श्रिताः । कुरु कर्म शुभं वीर एताः सर्वा विमोक्षय ।। २० ।। ये मेरी चार सखियाँ और हैं, जो अभी जलमें ही पड़ी हैं। वीरवर! आप यह पुण्य कर्म कीजिये; इन सबको शापसे छुड़ा दीजिये ।। २० ।।

वैशम्पायन उवाच

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