महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1500, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंधर्मे स्थितः सत्यधृतिः कौन्तेयोऽथ युधिष्ठिरः । जित्वा तु पृथिवीं सर्वां राजसूयं करिष्यति ॥ २९ ॥ ‘सदा धर्मपर स्थित रहनेवाले सत्यवादी कुन्तीनन्दन महाराज युधिष्ठिर सारी पृथिवीको जीतकर राजसूययज्ञ करेंगे ॥ २९ ॥
तत्रागच्छन्ति राजानः पृथिव्यां नृपसंज्ञिताः । बहूनि रत्नान्यादाय आगमिष्यति ते पिता ॥ ३० ॥ ‘उस समय वहाँ भूमण्डलके नरेशनामधारी सभी राजा आयेंगे। तुम्हारे पिता भी बहुत-से रत्नोंकी भेंट लेकर उस समय उपस्थित होंगे ॥ ३० ॥
एकसार्थं प्रयातासि चित्रवाहनसेवया । द्रक्ष्यामि राजसूये त्वां पुत्रं पालय मा शुचः ॥ ३१ ॥ ‘चित्रवाहनकी सेवाके निमित्त उन्हींके साथ राजसूययज्ञमें तुम भी चली आना। मैं वहीं तुमसे मिलूँगा। इस समय पुत्रका पालन करो और शोक छोड़ दो ॥ ३१ ॥
बभ्रुवाहननाम्ना तु मम प्राणो महीचरः । तस्माद् भरस्व पुत्रं वै पुरुषं वंशवर्धनम् ॥ ३२ ॥ ‘बभ्रुवाहनके नामसे मेरा प्राण ही इस भूतलपर विद्यमान है, अतः तुम इस पुत्रका भरण-पोषण करो। यह इस वंशको बढ़ानेवाला पुरुषरत्न है ॥ ३२ ॥
चित्रवाहनदायादं धर्मात् पौरवनन्दनम् । पाण्डवानां प्रियं पुत्रं तस्मात् पालय सर्वदा ॥ ३३ ॥ ‘यह धर्मतः चित्रवाहनका पुत्र है; किंतु शरीरसे पूरुवंशको आनन्दित करनेवाला है। अतः पाण्डवोंके इस प्रिय पुत्रका तुम सदा पालन करो ॥ ३३ ॥
विप्रयोगेन संतापं मा कृथास्त्वमनिन्दिते । चित्राङ्गदामेवमुक्त्वा गोकर्णमभितोऽगमत् ॥ ३४ ॥ ‘सती-साध्वी प्रिये! मेरे वियोगसे तुम संतप्त न होना।’ चित्रांगदासे ऐसा कहकर अर्जुन गोकर्णतीर्थकी ओर चल दिये ॥ ३४ ॥
आद्यं पशुपतेः स्थानं दर्शनादेव मुक्तिदम् । यत्र पापोऽपि मनुजः प्राप्नोत्यभयदं पदम् ॥ ३५ ॥ वह भगवान् शंकरका आदिस्थान है और दर्शनमात्रसे मोक्ष देनेवाला है। पापी मनुष्य भी वहाँ जाकर निर्भय पद प्राप्त कर लेता है ॥ ३५ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वण्यर्जुनवनवासपर्वण्यर्जुनतीर्थयात्रायां षोडशाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २१६ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत अर्जुनवनवासपर्वमें अर्जुनकी तीर्थयात्रासे सम्बन्ध रखनेवाला दो सौ सोलहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २१६ ॥