भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1503

ततोऽर्जुनं वासुदेवस्तां चर्यां पर्यपृच्छत । किमर्थं पाण्डवैतानि तीर्थान्यनुचरस्युत ।। ६ ।। तब भगवान् वासुदेवने अर्जुनसे उनकी जीवनचर्याके सम्बन्धमें पूछा—‘पाण्डव! तुम किसलिये तीर्थोंमें विचर रहे हो?’ ।। ६ ।।

ततोऽर्जुनो यथावृत्तं सर्वमाख्यातवांस्तदा । श्रुत्वोवाच च वार्ष्णेय एवमेतदिति प्रभुः ।। ७ ।। यह सुनकर अर्जुनने उन्हें सारा वृत्तान्त ज्यों-का-त्यों सुना दिया। सब कुछ सुनकर भगवान् श्रीकृष्ण बोले—‘यह बात ऐसी ही है’ ।। ७ ।।

तौ विहृत्य यथाकामं प्रभासे कृष्णपाण्डवौ । महीधरं रैवतकं वासायैवाभिजग्मतुः ।। ८ ।। तदनन्तर श्रीकृष्ण और अर्जुन दोनों प्रभासक्षेत्रमें इच्छानुसार घूम-फिरकर रैवतक पर्वतपर चले गये। उन्हें रातको वहीं ठहरना था ।। ८ ।।

पूर्वमेव तु कृष्णस्य वचनात् तं महीधरम् । पुरुषा मण्डयाञ्चक्रुरुपजह्रुश्च भोजनम् ।। ९ ।। भगवान् श्रीकृष्णकी आज्ञासे उनके सेवकोंने पहलेसे ही आकर उस पर्वतको सजा रखा था और वहाँ भोजन भी तैयार करके रख लिया था ।। ९ ।।

प्रतिगृह्यार्जुनः सर्वमुपभुज्य च पाण्डवः ।