भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

पृष्ठ 1508, कुल 2256 में से

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पृष्ठ 1508

दृष्ट्वैव तामर्जुनस्य कन्दर्पः समजायत । तं तदैकाग्रमनसं कृष्णः पार्थमलक्षयत् ॥ १५ ॥ उसे देखते ही अर्जुनके हृदयमें कामाग्नि प्रज्वलित हो उठी। उनका चित्त उसीके चिन्तनमें एकाग्र हो गया। भगवान् श्रीकृष्णने अर्जुनकी इस मनोदशाको भाँप लिया ॥ १५ ॥

अब्रवीत् पुरुषव्याघ्रः प्रहसन्निव भारत । वनेचरस्य किमिदं कामेनालोड्यते मनः ॥ १६ ॥ फिर वे पुरुषोतम हँसते हुए-से बोले—'भारत! यह क्या, वनवासीका मन भी इस तरह कामसे उन्मथित हो रहा है? ॥ १६ ॥

ममैषा भगिनी पार्थ सारणस्य सहोदरा । सुभद्रा नाम भद्रं ते पितुर्मे दयिता सुता । यदि ते वर्तते बुद्धिर्वक्ष्यामि पितरं स्वयम् ॥ १७ ॥ 'कुन्तीनन्दन! यह मेरी बहिन और सारणकी सगी बहिन है, तुम्हारा कल्याण हो, इसका नाम सुभद्रा है। यह मेरे पिताकी बड़ी लाड़िली कन्या है। यदि तुम्हारा विचार इससे ब्याह करनेका हो तो मैं पितासे स्वयं कहूँगा' ॥ १७ ॥

अर्जुन उवाच

दुहिता वसुदेवस्य वासुदेवस्य च स्वसा । रूपेण चैषा सम्पन्ना कमिवैषा न मोहयेत् ॥ १८ ॥ अर्जुनने कहा—यह वसुदेवजीकी पुत्री, साक्षात् आप वासुदेवकी बहिन और अनुपम रूपसे सम्पन्न है, फिर यह किसका मन न मोह लेगी ॥ १८ ॥

कृतमेव तु कल्याणं सर्वं मम भवेद् ध्रुवम् । यदि स्यान्मम वार्ष्णेयी महिषीयं स्वसा तव ॥ १९ ॥ सखे! यदि यह वृष्णिकुलकी कुमारी और आपकी बहिन सुभद्रा मेरी रानी हो सके तो निश्चय ही मेरा समस्त कल्याणमय मनोरथ पूर्ण हो जाय ॥ १९ ॥

प्राप्तौ तु क उपायः स्यात् तं ब्रवीहि जनार्दन । आस्थास्यामि तदा सर्वं यदि शक्यं नरेण तत् ॥ २० ॥ जनार्दन! बताइये, इसे प्राप्त करनेका क्या उपाय हो सकता है? यदि मनुष्यके द्वारा कर सकने योग्य होगा तो वह सारा प्रयत्न मैं अवश्य करूँगा ॥ २० ॥

वासुदेव उवाच

स्वयंवरः क्षत्रियाणां विवाहः पुरुषर्षभ । स च संशयितः पार्थ स्वभावस्यानिमित्ततः ॥ २१ ॥

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