महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंरथेष् plug -> रथेष्वा नीयमानेषु कवचेषु ध्वजेषु च । अभिक्रन्दे नृवीराणां तदासीत् तुमुलं महत् ॥ १९ ॥ रथ, कवच और ध्वजाओंके लाये जाते समय चारों ओर उन नर-वीरोंके कोलाहलसे वहाँ बड़ी भारी तुमुल ध्वनि व्याप्त हो गयी ॥ १९ ॥ वनमाली ततः क्षीबः कैलासशिखरोपमः । नीलवासा मदोत्सिक्त इदं वचनमब्रवीत् ॥ २० ॥ तदनन्तर कैलासशिखरके समान गौरवर्णवाले नील वस्त्र और वनमाला धारण करनेवाले बलरामजी उन यादवोंसे इस प्रकार बोले— ॥ २० ॥ किमिदं कुरुथाप्रज्ञास्तूष्णींभूते जनार्दने । अस्य भावमविज्ञाय संक्रुद्धा मोघगर्जिताः ॥ २१ ॥ 'मूर्खो! श्रीकृष्ण तो चुपचाप बैठे हैं, तुम यह क्या कर रहे हो? इनका अभिप्राय जाने बिना ही तुम इतने कुपित हो उठे। तुमलोगोंकी यह गर्जना व्यर्थ ही है ॥ २१ ॥ एष तावदभिप्रायमाख्यातु स्वं महामतिः । यदस्य रुचिरं कर्तुं तत् कुरुध्वमतन्द्रिताः ॥ २२ ॥ 'पहले परम बुद्धिमान् श्रीकृष्ण अपना अभिप्राय बतावें। तदनन्तर जो कर्तव्य इन्हें उचित जान पड़े, उसीका आल