महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहमारा त्याग कर सकते हैं। निष्पाप नरेश! आप तो भगवान् रुद्रके ही समीप जाइये। अब वे ही आपका यज्ञ करायेंगे' ।। ३४-३५ ।।
साधिक्षेपं वचः श्रुत्वा संक्रुद्धः श्वेतकिर्नृपः ।
कैलासं पर्वतं गत्वा तप उग्रं समास्थितः ।। ३६ ।।
ब्राह्मणोंका यह आक्षेपयुक्त वचन सुनकर राजा श्वेतकिको बड़ा क्रोध हुआ। वे कैलास पर्वतपर जाकर उग्र तपस्यामें लग गये ।। ३६ ।।
आराधयन् महादेवं नियतः संशितव्रतः ।
उपवासपरो राजन् दीर्घकालमतिष्ठत ।। ३७ ।।
राजन्! तीक्ष्ण व्रतका पालन करनेवाले राजा श्वेतकि मन-इन्द्रियोंके संयमपूर्वक महादेवजीकी आराधना करते हुए बहुत दिनोंतक निराहार खड़े रहे ।। ३७ ।।
कदाचिद् द्वादशे काले कदाचिदपि षोडशे ।
आहारमकरोद् राजा मूलानि च फलानि च ।। ३८ ।।
वे कभी बारहवें दिन और कभी सोलहवें दिन फल-मूलका आहार कर लेते थे ।। ३८ ।।
ऊर्ध्वबाहुस्त्वनिमिषस्तिष्ठन् स्थाणुरिवाचलः ।
षण्मासानभवद् राजा श्वेतकिः सुसमाहितः ।। ३९ ।।
दोनों बाहें ऊपर उठाकर एकटक देखते हुए राजा श्वेतकि एकाग्रचित हो छः महीनोंतक ठूँठकी तरह अविचल भावसे खड़े रहे ।। ३९ ।।
तं तथा नृपशार्दूलं तप्यमानं महत् तपः ।
शंकरः परमप्रीत्या दर्शयामास भारत ।। ४० ।।
भारत! उन नृपश्रेष्ठको इस प्रकार भारी तपस्या करते देख भगवान् शंकरने अत्यन्त प्रसन्न होकर उन्हें दर्शन दिया ।। ४० ।।
उवाच चैनं भगवान् स्निग्धगम्भीरया गिरा ।
प्रीतोऽस्मि नरशार्दूल तपसा ते परंतप ।। ४१ ।।
और स्नेहपूर्वक गम्भीर वाणीमें भगवान्ने उनसे कहा—'परंतप! नरश्रेष्ठ! मैं तुम्हारी तपस्यासे बहुत प्रसन्न हूँ ।। ४१ ।।
वरं वृणीष्व भद्रं ते यं त्वमिच्छसि पार्थिव ।
एतच्छ्रुत्वा तु वचनं रुद्रस्यामिततेजसः ।। ४२ ।।
प्रणिपत्य महात्मानं राजर्षिः प्रत्यभाषत ।
'भूपाल! तुम्हारा कल्याण हो। तुम जैसा चाहते हो, वैसा वर माँग लो।' अमिततेजस्वी रुद्रका यह वचन सुनकर राजर्षि श्वेतकिने परमात्मा शिवके चरणोंमें प्रणाम किया और इस प्रकार कहा— ।। ४२ १/२ ।।
यदि मे भगवान् प्रीतः सर्वलोकनमस्कृतः ।। ४३ ।।