महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1544, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंपूज्यमानो महाभागैर्ब्राह्मणैर्वेदपारगैः । वन्दिभिः स्तूयमानश्च नागरैश्चाभिनन्दितः ॥ ६२ ॥ उन महामना नरेशका वह यज्ञ पूरा होनेपर उसमें जो महातेजस्वी सदस्य और ऋत्विज् दीक्षित हुए थे, वे सब दुर्वासाजीकी आज्ञा ले अपने-अपने स्थानको चले गये। राजन्! वे महान् सौभाग्यशाली नरेश भी वेदोंके पारंगत महाभाग ब्राह्मणोंद्वारा सम्मानित हो उस समय अपनी राजधानीमें गये। उस समय वन्दीजनोंने उनका यश गाया और पुरवासियोंने अभिनन्दन किया ॥ ६०—६२ ॥
एवंवृत्तः स राजर्षिः श्वेतकिर्नृपसत्तमः । कालेन महता चापि ययौ स्वर्गमभिष्टुतः ॥ ६३ ॥ ऋत्विग्भिः सहितः सर्वैः सदस्यैश्च समन्वितः । तस्य सत्रे पपौ वह्निर्द्विर्दश वत्सरान् ॥ ६४ ॥ नृपश्रेष्ठ राजर्षि श्वेतकिका आचार-व्यवहार ऐसा ही था। वे दीर्घकालके पश्चात् अपने यज्ञके सम्पूर्ण सदस्यों तथा ऋत्विजोंसहित देवताओंसे प्रशंसित हो स्वर्गलोकमें गये। उनके यज्ञमें अग्निने लगातार बारह वर्षोंतक घृतपान किया था ॥ ६३-६४ ॥
सततं चाज्यधाराभिरैकात्म्ये तत्र कर्मणि । हविषा च ततो वह्निः परां तृप्तिमगच्छत ॥ ६५ ॥ उस अद्वितीय यज्ञमें निरन्तर घीकी अविच्छिन्न धाराओंसे अग्निदेवको बड़ी तृप्ति प्राप्त हुई ॥ ६५ ॥
न चैच्छत् पुनरादातुं हविरन्यस्य कस्यचित् । पाण्डुवर्णो विवर्णश्च न यथावत् प्रकाशते ॥ ६६ ॥ अब उन्हें फिर दूसरे किसीका हविष्य ग्रहण करनेकी इच्छा नहीं रही। उनका रंग सफेद हो गया, कान्ति फीकी पड़ गयी तथा वे पहलेकी भाँति प्रकाशित नहीं होते थे ॥ ६६ ॥
ततो भगवतो वह्नेर्विकारः समजायत । तेजसा विप्रहीणश्च ग्लानिश्चैनं समाविशत् ॥ ६७ ॥ तब भगवान् अग्निदेवके उदरमें विकार हो गया। वे तेजसे हीन हो ग्लानिको प्राप्त होने लगे ॥ ६७ ॥
स लक्षयित्वा चात्मानं तेजोहीनं हुताशनः । जगाम सदनं पुण्यं ब्रह्मणो लोकपूजितम् ॥ ६८ ॥ अपनेको तेजसे हीन देख अग्निदेव ब्रह्माजीके लोकपूजित पुण्यधाममें गये ॥ ६८ ॥
तत्र ब्रह्माणमासीनमिदं वचनमब्रवीत् । भगवन् परमा प्रीतिः कृत्वा मे श्वेतकेतुना ॥ ६९ ॥ वहाँ बैठे हुए ब्रह्माजीसे वे यह वचन बोले—'भगवन्! राजा श्वेतकिने अपने यज्ञमें मुझे परम संतुष्ट कर दिया ॥ ६९ ॥