महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदौड़े गये। खाण्डववनमें पहुँचकर उत्तम बलका आश्रय ले वायुका सहारा पाकर कुपित अग्निदेव सहसा प्रज्वलित हो उठे ।। ७७-७८ ।। प्रदीप्तं खाण्डवं दृष्ट्वा ये स्युस्तत्र निवासिनः । परमं यत्नमातिष्ठन् पावकस्य प्रशान्तये ।। ७९ ।। खाण्डववनको जलते देख वहाँ रहनेवाले प्राणियोंने उस आगको बुझानेके लिये बड़ा यत्न किया ।। ७९ ।। करैस्तु करिणः शीघ्रं जलमादाय सत्वराः । सिषिचुः पावकं क्रुद्धाः शतशोऽथ सहस्रशः ।। ८० ।। सैकड़ों और हजारोंकी संख्यामें हाथी अपनी सूँडोंमें जल लेकर शीघ्रतापूर्वक दौड़े आते और क्रोधपूर्वक उतावलीके साथ आगपर उस जलको उड़ेल दिया करते थे ।। ८० ।। बहुशीर्षास्ततो नागाः शिरोभिर्जलसंततिम् । मुमुचुः पावकाभ्याशे सत्वराः क्रोधमूर्च्छिताः ।। ८१ ।। अनेक सिरवाले नाग भी क्रोधसे मूर्च्छित हो अपने मस्तकोंद्वारा अग्निके समीप शीघ्रतापूर्वक जलकी धारा बरसाने लगे ।। ८१ ।। तथैवान्यानि सत्त्वानि नानाप्रहरणोद्यमैः । विलयं पावकं शीघ्रम नयन् भरतर्षभ ।। ८२ ।। भरतश्रेष्ठ! इसी प्रकार दूसरे-दूसरे जीवोंने भी अनेक प्रकारके प्रहारों (धूल झोंकने आदि) तथा उद्यमों (जल छिड़कने आदि)-के द्वारा शीघ्रतापूर्वक उस आगको बुझा दिया ।। ८२ ।। अनेन तु प्रकारेण भूयो भूयश्च प्रज्वलन् । सप्तकृत्वः प्रशमितः खाण्डवे हव्यवाहनः ।। ८३ ।। इस तरह खाण्डववनमें अग्निने बार-बार प्रज्वलित होकर सात बार उसे जलानेका प्रयास किया; परंतु प्रतिबार वहाँके निवासियोंने उन्हें बुझा दिया ।। ८३ ।।
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि खाण्डवदाहपर्वणि अग्निपराभवे द्वाविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ।। २२२ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत खाण्डवदाहपर्वमें अग्निपराभवविषयक दो सौ बाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २२२ ।।