महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1552, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंनवमेघप्रतीकाशं ज्वलन्तमिव च श्रिया । आश्रितौ तं रथश्रेष्ठं शक्रायुधसमावुभौ ॥ १४ ॥ वह रथ नूतन मेघके समान प्रतीत होता था और अपनी दिव्य शोभासे प्रज्वलित-सा हो रहा था। इन्द्र-धनुषके समान कान्तिवाले श्रीकृष्ण और अर्जुन उस श्रेष्ठ रथके समीप गये ॥ १४ ॥
तापनीया सुरुचिरा ध्वजयष्टिरनुत्तमा । तस्यां तु वानरो दिव्यः सिंहशार्दूलकेतनः ॥ १५ ॥ उस रथका ध्वजदण्ड बड़ा सुन्दर और सुवर्णमय था। उसके ऊपर सिंह और व्याघ्रके समान भयंकर आकृतिवाला दिव्य वानर बैठा था ॥ १५ ॥
दिधक्षन्निव तत्र स्म संस्थितो मूर्ध्न्यशोभत । ध्वजे भूतानि तत्रासन् विविधानि महान्ति च ॥ १६ ॥ नादेन रिपुसैन्यानां येषां संज्ञा प्रणश्यति । उस रथके शिखरपर बैठा हुआ वह वानर ऐसा जान पड़ता था, मानो शत्रुओंको भस्म कर डालना चाहता हो। उस ध्वजमें और भी नाना प्रकारके बड़े भयंकर प्राणी रहते थे, जिनकी आवाज सुनकर शत्रु-सैनिकोंके होश उड़ जाते थे ॥ १६ १/२ ॥
स तं नानापताकाभिः शोभितं रथसत्तमम् ॥ १७ ॥ प्रदक्षिणमुपावृत्य दैवतेभ्यः प्रणम्य च । संनद्धः कवची खड्गी बद्धगोधाङ्गुलित्रकः ॥ १८ ॥ आरुरोह तदा पार्थो विमानं सुकृती यथा । वह श्रेष्ठ रथ भाँति-भाँतिकी पताकाओंसे सुशोभित हो रहा था। अर्जुनने कमर कस ली, कवच और तलवार बाँध ली, दस्ताने पहन लिये तथा रथकी परिक्रमा और देवताओंको प्रणाम करके वे उसपर आरूढ़ हुए, ठीक वैसे ही, जैसे कोई पुण्यात्मा विमानपर बैठता है ॥ १७-१८ १/२ ॥
तच्च दिव्यं धनुः श्रेष्ठं ब्रह्मणा निर्मितं पुरा ॥ १९ ॥ गाण्डीवमुपसंगृह्य बभूव मुदितोऽर्जुनः । हुताशनं पुरस्कृत्य ततस्तदपि वीर्यवान् ॥ २० ॥ जग्राह बलमास्थाय ज्यया च युयुजे धनुः । मौर्व्यां तु योज्यमानायां बलिना पाण्डवेन ह ॥ २१ ॥ येऽशृण्वन् कूजितं तत्र तेषां वै व्यथितं मनः ।