महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकल्यौ स्वो भगवन् योद्धुमपि सर्वैः सुरासुरैः । किं पुनर्वज्रिणैकेन पन्नगार्थे युयुत्सता ॥ ३० ॥ इसके बाद अस्त्रविद्याके ज्ञाता एवं शस्त्रसम्पन्न अर्जुन और श्रीकृष्णने प्रसन्न होकर अग्निदेवसे कहा—‘भगवन्! अब हम दोनों रथ और ध्वजासे युक्त हो सम्पूर्ण देवताओं तथा असुरोंसे भी युद्ध करनेमें समर्थ हो गये हैं; फिर तक्षक नागके लिये युद्धकी इच्छा रखनेवाले अकेले वज्रधारी इन्द्रसे युद्ध करना क्या बड़ी बात है?’ ॥ २९-३० ॥
अर्जुन उवाच
चक्रपाणिर्हृषीकेशो विचरन् युधि वीर्यवान् । चक्रेण भस्मसात् सर्वं विसृष्टेन तु वीर्यवान् । त्रिषु लोकेषु तन्नास्ति यन्न कुर्याज्जनार्दनः ॥ ३१ ॥ अर्जुन बोले—अग्निदेव! सबकी इन्द्रियोंके प्रेरक ये महापराक्रमी जनार्दन जब हाथमें चक्र लेकर युद्धमें विचरेंगे, उस समय त्रिलोकीमें ऐसी कोई भी वस्तु नहीं है, जिसे ये चक्रके प्रहारसे भस्म न कर सकें ॥ ३१ ॥
गाण्डीवं धनुरादाय तथाक्षय्ये महेषुधी । अहमप्युत्सहे लोकान् विजेतुं युधि पावक ॥ ३२ ॥ पावक! मैं भी यह गाण्डीव धनुष और ये दोनों बड़े-बड़े अक्षय तरकस लेकर सम्पूर्ण लोकोंको युद्धमें जीत लेनेका उत्साह रखता हूँ ॥ ३२ ॥
सर्वतः परिवार्यैवं दावमेतं महाप्रभो । कामं सम्प्रज्वलाद्यैव कल्यौ स्वः साह्यकर्मणि ॥ ३३ ॥ महाप्रभो! अब आप इस सम्पूर्ण वनको चारों ओरसे घेरकर आज ही इच्छानुसार जलाइये। हम आपकी सहायताके लिये तैयार हैं ॥ ३३ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तः स भगवान् दाशार्हेणार्जुनेन च । तैजसं रूपमास्थाय दावं दग्धुं प्रचक्रमे ॥ ३४ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! श्रीकृष्ण और अर्जुनके ऐसा कहनेपर भगवान् अग्निने तेजोमय रूप धारण करके खाण्डववनको सब ओरसे जलाना आरम्भ कर दिया ॥ ३४ ॥
सर्वतः परिवार्याथ सप्तार्चिर्ज्वलनस्तथा । ददाह खाण्डवं दावं युगान्तमिव दर्शयन् ॥ ३५ ॥ सात ज्वालामयी जिह्वाओंवाले अग्निदेव खाण्डव-वनको सब ओरसे घेरकर महाप्रलयका-सा दृश्य उपस्थित करते हुए जलाने लगे ॥ ३५ ॥
प्रतिगृह्य समाविश्य तद् वनं भरतर्षभ ।