महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें(मयदर्शनपर्व)
सप्तविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः
देवताओंकी पराजय, खाण्डववनका विनाश और मयासुरकी रक्षा
वैशम्पायन उवाच
तथा शैलनिपातेन भीषिताः खाण्डवालयाः ।
दानवा राक्षसा नागास्तरक्ष्वृक्षवनौकसः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! इस प्रकार पर्वतशिखरके गिरनेसे खाण्डववनमें रहनेवाले दानव, राक्षस, नाग, चीते तथा रीछ आदि वनचर प्राणी भयभीत हो उठे ।। १ ।।
द्विपाः प्रभिन्नाः शार्दूलाः सिंहाः केसरिणस्तथा ।
मृगाश्च महिषाश्चैव शतशः पक्षिणस्तथा ॥ २ ॥
समुद्विग्ना विससृपुस्तथान्या भूतजातयः ।
मदकी धारा बहानेवाले हाथी, शार्दूल, केसरी, सिंह, मृग, भैंस, सैकड़ों पक्षी तथा दूसरी-दूसरी जातिके प्राणी अत्यन्त उद्विग्न हो इधर-उधर भागने लगे ।। २ १/२ ।।
तं दावं समुदैक्षन्त कृष्णौ चाभ्युद्यतायुधौ ॥ ३ ॥
उत्पातनादशब्देन त्रासिता इव च स्थिताः ।
ते वनं प्रसमीक्ष्याथ दह्यमानमनेकधा ॥ ४ ॥
कृष्णमभ्युद्यतास्त्रं च नादं मुमुचुरुल्बणम् ।
उन्होंने उस जलते हुए वनको और मारनेके लिये अस्त्र उठाये हुए श्रीकृष्ण तथा अर्जुनको देखा। उत्पात और आर्तनादके शब्दसे उस वनमें खड़े हुए वे सभी प्राणी संत्रस्त-से हो उठे थे। उस वनको अनेक प्रकारसे दग्ध होते देख और अस्त्र उठाये हुए श्रीकृष्णपर दृष्टि डाल भयानक आर्तनाद करने लगे ।। ३-४ १/२ ।।
तेन नादेन रौद्रेण नादेन च विभावसोः ॥ ५ ॥
ररास गगनं कृत्स्नमुत्पातजलदैरिव ।
उस भयंकर आर्तनाद और अग्निदेवकी गर्जनासे वहाँका सम्पूर्ण आकाश मानो उत्पातकालिक मेघोंकी गर्जनासे गूँज रहा था ।। ५ १/२ ।।
ततः कृष्णो महाबाहुः स्वतेजोभास्वरं महत् ॥ ६ ॥
चक्रं व्यसृजदत्युग्रं तेषां नाशाय केशवः ।