भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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इच्छेत् कोऽर्कांशुसेनायां चर्तुमैरावतं विना । शतान्यशीतिरष्टौ च सहस्राणि च विंशतिः ॥ १३७ ॥ सर्पाणां प्रग्रहा यान्ति धृतराष्ट्रो यदैजति । ये चैनमुपसर्पन्ति ये च दूरपथं गताः ॥ १३८ ॥ अहमैरावतज्येष्ठभ्रातृभ्योऽकरवं नमः । यस्य वासः कुरुक्षेत्रे खाण्डवे चाभवत् पुरा ॥ १३९ ॥ तं नागराजमस्तौषं कुण्डलार्थाय तक्षकम् । तक्षकश्चाश्वसेनश्च नित्यं सहचरावुभौ ॥ १४० ॥ कुरुक्षेत्रं च वसतां नदीमिक्षुमतीमनु । जघन्यजस्तक्षकस्य श्रुतसेनेति यः श्रुतः ॥ १४१ ॥ अवसद् यो महद्द्युम्नि प्रार्थयन् नागमुख्यताम् । करवाणि सदा चाहं नमस्तस्मै महात्मने ॥ १४२ ॥ ऐरावत नागके सिवा दूसरा कौन है, जो सूर्यदेवकी प्रचण्ड किरणोंके सैन्यमें विचरनेकी इच्छा कर सकता है? ऐरावतके भाई धृतराष्ट्र जब सूर्यदेवके साथ प्रकाशित होते और चलते हैं, उस समय अट्ठाईस हजार आठ सर्प सूर्यके घोड़ोंकी बागडोर बनकर जाते हैं। जो इनके साथ जाते हैं और जो दूरके मार्गपर जा पहुँचे हैं, ऐरावतके उन सभी छोटे बन्धुओंकों मैंने नमस्कार किया है। जिनका निवास सदा कुरुक्षेत्र और खाण्डववनमें रहा है, उन नागराज तक्षककी मैं कुण्डलोंके लिये स्तुति करता हूँ। तक्षक और अश्वसेन—ये दोनों नाग सदा साथ विचरनेवाले हैं। ये दोनों कुरुक्षेत्रमें इक्षुमती नदीके तटपर रहा करते थे। जो तक्षकके छोटे भाई हैं, श्रुतसेन नामसे जिनकी ख्याति है तथा जो पाताललोकमें नागराजकी पदवी पानेके लिये सूर्यदेवकी उपासना करते हुए कुरुक्षेत्रमें रहे हैं, उन महात्माको मैं सदा नमस्कार करता हूँ ॥ १३७–१४२ ॥

एवं स्तुत्वा स विप्रर्षिरुत्तङ्को भुजगोत्तमान् । नैव ते कुण्डले लेभे ततश्चिन्तामुपागमत् ॥ १४३ ॥ इस प्रकार उन श्रेष्ठ नागोंकी स्तुति करनेपर भी जब ब्रह्मर्षि उत्तंक उन कुण्डलोंको न पा सके तो उन्हें बड़ी चिन्ता हुई ॥ १४३ ॥

एवं स्तुवन्नपि नागान् यदा ते कुण्डले नालभत तदापश्यत् स्त्रियौ तन्त्रे अधिरोप्य सुवेमे पटं वयन्त्यौ । तस्मिंस्तन्त्रे कृष्णाः सिताश्च तन्तवश्चक्रं चापश्यद् द्वादशारं षड्भिः कुमारैः परिवर्तयमानं पुरुषं चापश्यदश्वं च दर्शनीयम् ॥ १४४ ॥ स तान् सर्वांस्तुष्टाव एभिर्मन्त्रवदेव श्लोकैः ॥ १४५ ॥ इस प्रकार नागोंकी स्तुति करते रहनेपर भी जब वे उन दोनों कुण्डलोंको प्राप्त न कर सके, तब उन्हें वहाँ दो स्त्रियाँ दिखायी दीं, जो सुन्दर करघेपर रखकर सूतके तानेमें वस्त्र बुन रही थीं, उस तानेमें उत्तंक मुनिने काले और सफेद दो प्रकारके सूत और बारह अरोंका

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