भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 1582

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एकोनत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः

जरिताका अपने बच्चोंकी रक्षाके लिये चिन्तित होकर विलाप करना

वैशम्पायन उवाच

ततः प्रज्वलिते वह्नौ शार्ङ्गकास्ते सुदुःखिताः ।
व्यथिताः परमोद्विग्ना नाधिजग्मुः परायणम् ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर जब आग प्रज्वलित हुई, तब वे शार्ङ्गक शिशु बहुत दुःखी, व्यथित और अत्यन्त उद्विग्न हो गये। उस समय उन्हें अपना कोई रक्षक नहीं जान पड़ता था ॥ १ ॥

निशम्य पुत्रकान् बालान् माता तेषां तपस्विनी ।
जरिता शोकदुःखार्ता विललाप सुदुःखिता ॥ २ ॥
उन बच्चोंको छोटे जानकर उनकी तपस्विनी माता शोक और दुःखसे आतुर हुई जरिता बहुत दुःखी होकर विलाप करने लगी ॥ २ ॥

जरितोवाच

अयमग्निर्दहन् कक्षमित आयाति भीषणः ।
जगत् संदीपयन् भीमो मम दुःखविवर्धनः ॥ ३ ॥
**जरिता बोली—**यह भयानक आग इस वनको जलाती हुई इधर ही बढ़ी आ रही है। जान पड़ता है, यह सम्पूर्ण जगत्को भस्म कर डालेगी। इसका स्वरूप भयंकर और मेरे दुःखको बढ़ानेवाला है ॥ ३ ॥

इमे च मां कर्षयन्ति शिशवो मन्दचेतसः ।
अबर्हाश्चरणैर्हीनाः पूर्वेषां नः परायणाः ॥ ४ ॥
ये सांसारिक ज्ञानसे शून्य चित्तवाले शिशु मुझे अपनी ओर आकर्षित करते हैं। इन्हें पाँखें नहीं निकलीं और अभीतक ये पैरोंसे भी हीन हैं, हमारे पितरोंके ये ही आधार हैं ॥ ४ ॥

त्रासयंश्चायमायाति लेलिहानो महीरुहान् ।
अजातपक्षाश्च सुता न शक्ताः सरणे मम ॥ ५ ॥
सबको त्रास देती और वृक्षोंको चाटती हुई यह आगकी लपट इधर ही चली आ रही है। हाय! मेरे बच्चे बिना पंखके हैं, मेरे साथ उड़ नहीं सकते ॥ ५ ॥

आदाय च न शक्नोमि पुत्रांस्तरितुमात्मना ।
न च त्यक्तुमहं शक्ता हृदयं दूयतीव मे ॥ ६ ॥