भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1587

तीव्र गतिसे गयी और बिलसे चूहेको ले जानेके कारण उसे आशीर्वाद देती हुई बोली — ॥ ५-६ ॥

यो नो द्वेष्टारमादाय श्येनराज प्रधावसि । भव त्वं दिवमास्थाय निरमित्रो हिरण्मयः ॥ ७ ॥ ‘श्येनराज! तुम मेरे शत्रुको लेकर उड़े जा रहे हो, इसलिये स्वर्गमें जानेपर तुम्हारा शरीर सोनेका हो जाय और तुम्हारे कोई शत्रु न रह जाय’ ॥ ७ ॥

स यदा भक्षितस्तेन श्येनेनाखुः पतत्त्रिणा । तदाहं तमनुज्ञाप्य प्रत्युपायां पुनर्गृहम् ॥ ८ ॥ जब उस पक्षिप्रवर बाजने चूहेको खा लिया, तब मैं उसकी आज्ञा लेकर पुनः घर लौट आयी ॥ ८ ॥

प्रविशध्वं बिलं पुत्रा विश्रब्धा नास्ति वो भयम् । श्येनेन मम पश्यन्त्या हृत आखुर्महात्मना ॥ ९ ॥ अतः बच्चो! तुमलोग विश्वासपूर्वक बिलमें घुसो। वहाँ तुम्हारे लिये भय नहीं है। महान् बाजने मेरी आँखोंके सामने ही चूहेका अपहरण किया था ॥ ९ ॥

शार्ङ्गका ऊचुः

न विद्महे हृतं मातः श्येनेनाखुं कथंचन । अविज्ञाय न शक्यामः प्रवेष्टुं विवरं भुवः ॥ १० ॥ शार्ङ्गका बोले—माँ! बाजने चूहेको पकड़ लिया, इसको हम नहीं जानते और जाने बिना हम इस बिलमें कभी प्रवेश नहीं कर सकते ॥ १० ॥

जरितोवाच

अहं तमभिजानामि हृतं श्येनेन मूषिकम् । नास्ति वोऽत्र भयं पुत्राः क्रियतां वचनं मम ॥ ११ ॥ जरिताने कहा—बेटो! मैं जानती हूँ, बाजने अवश्य चूहेको पकड़ लिया। तुमलोग मेरी बात मानो। इस बिलमें तुम्हें कोई भय नहीं है ॥ ११ ॥

शार्ङ्गका ऊचुः

न त्वं मिथ्योपचारेण मोक्षयेथा भयाद्धि नः । समाकुलेषु ज्ञानेषु न बुद्धिकृतमेव तत् ॥ १२ ॥ शार्ङ्गका बोले—माँ! तुम झूठे बहाने बनाकर हमें भयसे छुड़ानेकी चेष्टा न करो। संदिग्ध कार्योंमें प्रवृत्त होना बुद्धिमानीका काम नहीं है ॥ १२ ॥

न चोपकृतमस्माभिर्न चास्मान् वेत्थ ये वयम् । पीड्यमाना बिभर्ष्यास्मान् का सती के वयं तव ॥ १३ ॥