महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1590, कुल 2256 में से
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वैशम्पायन उवाच
एवं सम्भाष्य तेऽन्योन्यं मन्दपालस्य पुत्रकाः । तुष्टुवुः प्रयता भूत्वा यथाग्निं शृणु पार्थिव ।। ६ ।। **वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! इस प्रकार आपसमें बातें करके मन्दपालके वे पुत्र एकाग्रचित्त हो अग्निदेवकी स्तुति करने लगे; वह स्तुति सुनो ।। ६ ।।
जरितारिरुवाच
आत्मासि वायोज्र्वलन शरीरमसि वीरुधाम् । योनिरपश्च ते शुक्लं योनिस्त्वमसि चाम्भसः ।। ७ ।। **जरितारिने कहा—**अग्निदेव! आप वायुके आत्मस्वरूप और वनस्पतियोंके शरीर हैं। तृण-लता आदिकी योनि पृथ्वी और जल तुम्हारे वीर्य हैं, जलकी योनि भी तुम्हीं हो ।। ७ ।। ऊर्ध्वं चाधश्च सर्पन्ति पृष्ठतः पार्श्वतस्तथा । अर्चिषस्ते महावीर्य रश्मयः सवितुर्यथा ।। ८ ।। महावीर्य! आपकी ज्वालाएँ सूर्यकी किरणोंके समान ऊपर-नीचे, आगे-पीछे तथा अगल-बगल सब ओर फैल रही हैं ।। ८ ।।
सारिसृक्क उवाच
माता प्रणष्टा पितरं न विद्मः पक्षा जाता नैव नो धूमकेतो । न नस्त्राता विद्यते वै त्वदन्य- स्तस्मादस्मांस्त्राहि बालांस्त्वमग्ने ।। ९ ।। **सारिसृक्क बोला—**धूममयी ध्वजासे सुशोभित अग्निदेव! हमारी माता चली गयी, पिताका भी हमें पता नहीं है और हमारे अभी पंखतक नहीं निकले हैं। हमारा आपके सिवा दूसरा कोई रक्षक नहीं है; अतः आप ही हम बालकोंकी रक्षा करें ।। ९ ।। यदग्ने ते शिवं रूपं ये च ते सप्त हेतयः । तेन नः परिपाहि त्वमार्त्तान् वै शरणैषिणः ।। १० ।। अग्ने! आपका जो कल्याणमय स्वरूप है तथा आपकी जो सात ज्वालाएँ हैं, उन सबके द्वारा आप शरणमें आनेकी इच्छावाले हम आर्त प्राणियोंकी रक्षा कीजिये ।। १० ।। त्वमेवैकस्तपसे जातवेदो नान्यस्तप्ता विद्यते गोषु देव । ऋषीनस्मान् बालकान् पालयस्व परेणास्मान् प्रेहि वै हव्यवाह ।। ११ ।।