महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1595, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंभारत! मन्दपाल मुनि जब इस प्रकार वनमें (अपनी स्त्री एवं बच्चोंके लिये) विलाप कर रहे थे, उस समय लपिताने ईर्ष्यापूर्वक कहा— ॥ ७ ॥
न ते पुत्रेष्ववेक्षास्ति यानृषीनुक्तवानसि ।
तेजस्विनो वीर्यवन्तो न तेषां ज्वलनाद् भयम् ॥ ८ ॥
‘तुम्हें पुत्रोंको देखनेकी चिन्ता नहीं है। तुमने जिन ऋषियोंके नाम लिये हैं, वे तेजस्वी और शक्तिशाली हैं; उन्हें अग्निसे तनिक भी भय नहीं है ॥ ८ ॥
त्वयाग्नौ ते परीताश्च स्वयं हि मम संनिधौ ।
प्रतिश्रुतं तथा चेति ज्वलनेन महात्मना ॥ ९ ॥
‘मेरे पास ही तुमने अग्निदेवको स्वयं अपने पुत्र सौंपे थे और उन महात्मा अग्निने भी उनकी रक्षाके लिये प्रतिज्ञा की थी ॥ ९ ॥
लोकपालो न तां वाचमुक्त्वा मिथ्या करिष्यति ।
समक्षं बन्धुकृत्ये न तेन ते स्वस्थ मानसम् ॥ १० ॥
‘वे लोकपाल हैं। जब बात दे चुके हैं, तब उसे झूठी नहीं करेंगे। अतः स्वस्थ पुरुष! तुम्हारा मन अपने बच्चोंकी रक्षारूप बन्धुजनोचित कर्तव्यके पालनेके लिये उत्सुक नहीं है ॥ १० ॥
तामेव तु ममामित्रां चिन्तयन् परितप्यसे ।
ध्रुवं मयि न ते स्नेहो यथा तस्यां पुराभवत् ॥ ११ ॥
‘तुम तो मेरी दुश्मन उसी जरिता सौतके लिये चिन्ता करते हुए संतप्त हो रहे हो। पहले जरितामें तुम्हारा जैसा स्नेह था वैसा अवश्य ही मुझपर नहीं है ॥ ११ ॥
न हि पक्षवता न्याय्यं निःस्नेहेन सुहृज्जने ।
पीड्यमान उपद्रष्टुं शक्तेनात्मा कथंचन ॥ १२ ॥
‘जो सहायकोंसे सम्पन्न और शक्तिशाली है’ वह मुझ-जैसे अपने सुहृद् व्यक्तिपर स्नेह नहीं रखे और अपने आत्मीय जनको पीड़ित देखकर उसकी उपेक्षा करे, यह किसी प्रकार उचित नहीं कहा जा सकता ॥ १२ ॥
गच्छ त्वं जरितामेव यदर्थं परितप्यसे ।
चरिष्याम्यहमप्येका यथा कुपुरुषाश्रिता ॥ १३ ॥
‘अतः अब तुम उस जरिताके ही पास जाओ, जिसके लिये तुम इतने संतप्त हो रहे हो। मैं भी दुष्ट पुरुषके आश्रयमें पड़ी हुई स्त्रीकी भाँति अकेली ही विचरूँगी' ॥ १३ ॥
मन्दपाल उवाच
नाहमेवं चरे लोके यथा त्वमभिमन्यसे ।
अपत्यहेतोर्विचरे तच्च कृच्छ्रगतं मम ॥ १४ ॥