महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवहाँ मज्जा और मेदकी कई नहरें बह चलीं और उन सबको पीकर अग्निदेव पूर्ण तृप्त हो गये। तत्पश्चात् उन्होंने अर्जुनको दर्शन दिया ।। ६ ।। ततोऽन्तरिक्षाद् भगवानवतीर्य पुरंदरः। मरुद्गणैर्वृतः पार्थं केशवं चेदमब्रवीत् ॥ ७ ॥ उसी समय भगवान् इन्द्र मरुद्गणों एवं अन्य देवताओंके साथ आकाशसे उतरे और अर्जुन तथा श्रीकृष्णसे इस प्रकार बोले— ।। ७ ।। कृतं युवाभ्यां कर्मेदममरैरपि दुष्करम्। वरं वृणीतं तुष्टोऽस्मि दुर्लभं पुरुषेष्विह ॥ ८ ॥ ‘आप दोनोंने यह ऐसा कार्य किया है, जो देवताओंके लिये भी दुष्कर है। मैं बहुत प्रसन्न हूँ। इस लोकमें मनुष्योंके लिये जो दुर्लभ हो ऐसा कोई वर आप दोनों माँग लें’ ।। ८ ।। पार्थस्तु वरयामास शक्रादस्त्राणि सर्वशः। प्रदातुं तच्च शक्रस्तु कालं चक्रे महाद्युतिः ॥ ९ ॥ तब अर्जुनने इन्द्रसे सब प्रकारके दिव्यास्त्र माँगे। महातेजस्वी इन्द्रने उन अस्त्रोंको देनेके लिये समय निश्चित कर दिया ।। ९ ।।
यदा प्रसन्नो भगवान् महादेवो भविष्यति। तदा तुभ्यं प्रदास्यामि पाण्डवास्त्राणि सर्वशः ॥ १० ॥